सिंधिया की आमद से मप्र में निखरेगी कमल सरोवर की छटा

दिंनाक: 20 Mar 2020 18:36:04
 


         कृष्णमोहन झा          
 
पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं मध्यप्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे  ज्योतिरादित्य सिंधिया गत विधानसभा चुनाव के बाद जब प्रदेश में 15 सालों के बाद बनने जा रही कांग्रेस की सरकार का मुख्यमंत्री पद हासिल करने में असफल रह गए थे, तब से ही कांग्रेस के प्रति उनके मोहभंग की शुरुआत होने लगी थी। पिछले 14 महीनों के कमलनाथ सरकार के कार्यकाल के दौरान उन्होंने कभी किसानों के मुद्दे पर तो कभी अतिथि प्राध्यापकों के नियमितीकरण की मांग के पक्ष में खुलकर अपने विचारों का इजहार इस तरह किया कि वे सरकार की रीति नीति के प्रति अपने विरोध का एहसास मुख्यमंत्री कमलनाथ को भलीभांति करा सकें। कमलनाथ सरकार में शामिल उनके समर्थक मंत्रियों एवं पार्टी में उनके समर्थकों ने भी जब तब ऐसे बयान देने का सिलसिला जारी रखा, जिससे यह संदेश मिलता रहा कि उनकी निष्ठा मुख्यमंत्री से अधिक सिंधिया के नेतृत्व में अधिक है। 
 
पिछले 14 महीनों में जब भी ऐसी खबरें आई कि मुख्यमंत्री कमलनाथ से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी वापस लेकर किसी अन्य नेता को सौंपी जा सकती है, तब  सिंधिया उस पद की दौड़ में सदैव आगे रहे, परंतु कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इन 14 महीनों में अनिर्णय की स्थिति का शिकार बना रहा और सिंधिया के सब्र का बांध टूटने की कगार पर आ पहुंचा। पिछले एक माह में तीन राज्यसभा सीटों के चुनाव की चर्चा जिस तरह से पार्टी में चल रही थी,उससे भी उनकी निराशा गहराने लगी थी। राज्यसभा की इन तीन सीटों में से एक-एक सीट कांग्रेस एवं भाजपा को मिलना सुनिश्चित है,जबकि तीसरी सीट के लिए दोनों पार्टियों में जोड़-तोड़ का खेल प्रारंभ हो गया था। सिंधिया को यह एहसास हो चुका था राज्यसभा चुनाव में पार्टी के प्रथम उम्मीदवार वे नहीं होंगे और पार्टी पहले नंबर पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और दूसरे नंबर पर उन्हें ही रखेगी। उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि पार्टी में लगातार उन्हें हाशिए पर डालने की कोशिश हो रही है। पहले मुख्यमंत्री पद के लिए फिर प्रदेशाध्यक्ष और अब राज्यसभा के लिए पार्टी उम्मीदवार के चयन में अपनी उपेक्षा से उन्होंने खुद को इतना अपमानित महसूस किया कि 18 साल पार्टी में रहने के बाद उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कहने का फैसला कर लिया। 
 
भाजपा तो कब से उन्हें प्रवेश देने के लिए प्रतीक्षा कर रही थी । सिंधिया दरअसल किसी उचित अवसर की राह देख रहे थे और प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाले चुनाव में उन्हें वह अवसर उपलब्ध करा दिया। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अगले ही दिन राज्यसभा का उम्मीदवार भी बना लिया और राज्यसभा के लिए निर्वाचित होते ही अगर मोदी सरकार में भी उन्हें ससम्मान शामिल कर लिया जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। सिंधिया गुट के जो मंत्री एवं विधायक इस समय बेंगलुरु में ठहराए गए हैं, उन्हें भी राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद बनने वाली नई सरकार में भी सत्ता सुख भोगने का मौका मिल सकता है।सिंधिया के भाजपा में शामिल हो जाने के बाद कांग्रेस के और कई नेता उनका अनुसरण करने के लिए आगे आ सकते हैं। इसलिए कांग्रेस को उस स्थिति के लिए खुद को तैयार कर लेना चाहिए।
 
 ज्योतिरादित्य सिंधिया भले ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एवं वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ से आयु में काफी छोटे हो, परंतु प्रदेश में उनका अपना एक प्रभाव क्षेत्र है और इस सच्चाई से कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी भलीभांति वाकिफ है।उनकी भाषण शैली भी प्रभावोत्पादक है और युवाओं को आकर्षित करने की क्षमता भी उनके पास है। इसीलिए पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के चुनाव अभियान की बागडोर सौंपी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर के आगे उनकी क्षमताएं फीकी पड़ गई और वे ग्वालियर में अपनी लोकसभा सीट बचाने में भी असफल रहे, जबकि इसके पूर्व चार लोकसभा चुनाव में उन्होंने इसी सीट से शानदार विजय हासिल की थी। सबसे अच्छी बात तो यह है कि वे अपने ही निकट सहयोगी रहे व्यक्ति से हार गए, जिसे सिंधिया ने विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिलवाई थी। इसलिए उसने नाराज होकर भाजपा का दामन थाम लिया था।
 
ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार अभियान के प्रमुख थे।इसलिए चुनाव के बाद प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के मुखिया बनने के लिए उन्होंने भी अपनी दावेदारी पेश की थी। हालांकि उन्हें इसका मौका नहीं मिला, लेकिन उन्हें यह उम्मीद थी कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाकर इसकी क्षतिपूर्ति की जाएगी, लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी बात नहीं बनते नजर आने पर आखिर उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा भी उनकी महत्वाकांक्षा का अनुमान लगातार लगाती रही और उनके ही निकटतम परिजन भाजपा में शामिल होने के लिए उनका ब्रेनवाश करते रहे और आखिर में वह उन्हें भरोसा दिलाने में सफल हो गए की भाजपा में आने पर उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। अगर सिंधिया को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद की कुर्सी सौंप दी जाती तो भाजपा में शामिल होने की मंशा वह त्याग सकते थे।
 
सिंधिया ने भाजपा में शामिल होकर कांग्रेस को पूरी तरह हक्का-बक्का कर दिया है। कांग्रेस के पास अब ग्वालियर चंबल क्षेत्र में कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं बचा है। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के अंदर अपने निकटतम सहयोगियों में अग्रणी रहे एक मित्र की सलाह से अब वंचित रह जाएंगे, जिनके साथ स्कूल और कॉलेज से ही उनकी गहरी मित्रता थी। कांग्रेस की राजनीति में भी लगभग दोनों ने साथ में ही प्रवेश किया था। राहुल गांधी ने कांग्रेस से उनके इस्तीफे के बाद स्वयं कहा था कि केवल सिंधिया ही उनके निवास पर कभी भी बिना रोक-टोक के आ सकते थे। सिंधिया से अपनी निकटतम मैत्री के कारण राहुल गांधी कभी अनुमान ही नहीं लगा पाए कि वे इतना बड़ा फैसला लेने में भी परहेज नहीं करेंगे। ज्योतिराज सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद यह सवाल उठना भी लाजमी है कि क्या भाजपा में पहले से ही शामिल उनकी बुआ वसुंधरा राजे सिंधिया एवं यशोधरा राजे सिंधिया के बराबर उनका कद रहेगा। सिंधिया परिवार के तीन सदस्यों को एक सा सम्मान देने में भाजपा को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इधर सिंधिया को राज्य सभा प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भाजपा के नेताओं का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है ,जो पहले से ही राज्यसभा में जाने की महत्वाकांक्षा पाल बैठे थे। 
भाजपा के नए अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कांग्रेस के एक महत्वपूर्ण नेता को पार्टी में शामिल कराने में जो सफलता पाई है, उसमें केंद्रीय मंत्री अमित शाह की विशेष भूमिका रही है।
 
 सिंधिया द्वारा भाजपा का दामन थाम लिए जाने के बाद अब कांग्रेस को यह चिंता सताने लगी है कि राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को किस तरह संतुष्ट रखा जाए। गौरतलब है कि सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में पायलट ने कहा था कि इस संकट को टाला जा जाना चाहिए था। यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि राजस्थान विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद पायलट ने भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश कर दी थी, परंतु उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से संतुष्ट होने पर विवश कर दिया गया था। कांग्रेस को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं पायलट भी अपने असंतोष का खुलकर इजहार ना करने लगे। इसमें भी दो राय नहीं हो सकती की मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा से पायलट आज भी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए है। दरअसल कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी अब यह चुके हैं पार्टी का स्वर्णिम काल वापस लौटने की संभावनाएं धूमिल होती जा रही है। इसलिए अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति पार्टी नेताओं का एक वर्ग विचारधारा से भी समझौता करने का मन बनने लगा है। सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के फैसले पर भी उन्होंने ऐसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त की थी  अतः अब समय आ गया है कि पार्टी के बुजुर्ग नेता युवाओं को नेतृत्व सौंपने की खुद आगे होकर पहल करें। अगर ऐसा नहीं होता तो दूसरे राज्यों में भी सिंधिया के कदम को सही ठहराने वाले पार्टी नेताओं की संख्या में बढ़ोतरी होना स्वभाविक है।
 
 कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि उसके पास एक भी नेता ऐसा नहीं है,जो पार्टी के युवा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को निरापद राजनीतिक भविष्य की उम्मीद बनाने में समर्थ हो। सबसे बड़ी बात तो यह है कि पार्टी का नेतृत्व अतीत के कटु अनुभवों से कोई सबक लेने के लिए तैयार नहीं है। गत वर्ष कर्नाटक में भाजपा ने जिस तरह ऑपरेशन लोटस को अंजाम दिया था, उसके बाद तो कांग्रेस को मध्यप्रदेश में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए थी,लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भाजपा तो कब से इंतजार में थी कि कैसे सिंधिया के बढ़ते असंतोष के सहारे सत्ता की दहलीज तक पहुंचने की राह आसान बनाई जाए। पता नहीं राज्य की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री कमलनाथ और दूसरे वरिष्ठ नेता क्यों यह गलतफहमी पाले रहे कि सिंधिया कभी पार्टी छोड़कर नहीं जा सकते है, लेकिन सिंधिया तो कब से पार्टी छोड़ने का मन बना रहे हैं थे और आखिरकार उन्होंने  इसका फैसला कर ही लिया।  सवाल यह उठता है कि कर्नाटक का नाटक मध्यप्रदेश में दोहराए जाने के बाद अब कांग्रेस क्या कोई सबक लेने के लिए तैयार है।