यदि गांधीजी और संघ का स्वदेशी मंत्र चलता तो कोरोना का इतना कहर न होता

दिंनाक: 21 Mar 2020 13:49:15

 

    - रमेश शर्मा   

चीन से निकला कोरोना वायरस पूरी दुनिया में मानों एक कहर बन गया है। दुनिया के 162 देश इसकी चपेट में है और यूनेस्कों ने इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है।

भारत उन सौभाग्यशाली देशों में है जहां इसका प्रभाव अपेक्षाकृत सबसे कम है जबकि भारत चीन का पड़ौसी देश है। जबकि चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित देश इटली है। भारत में अब तक कुल 400 व्यक्ति ही प्रभावित माने गए हैं। इसमें ढाई सौ वे हैं जो विदेश से लौटे और बाकी वे जो उनके संपर्क में आए। भारत की इस बेहतर स्थिति के चलते ही इस्राइल जैसे अनेक देशों ने भारत से इस वायरस से लडऩे के लिए सहायता मांगी है।

यह सही है कि भारत इस वायरस से कम प्रभावित देश है फिर भी इसका आतंक भारत के प्रत्येक नागरिक को बैचेन किए है। भारत का सारा जीवन मानों अस्त व्यस्त हो गया है। बाजारों में भीड़ कम है। रेल्वे एयर ट्रैफिक प्रभावित है। पीडि़तों की संख्या कम होने के बावजूद यह कहर बनकर टूट पड़ा है। भले इस उथल-पुथल से भारत की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है लेकिन भारत में मानवीय जीवन को कोई क्षति नहीं पहुंची। इसके दो कारण हैं एक तो भारत सरकार द्वारा समय रहते उठाए गए सावधानी के कदम और दूसरा भारतीय समाज की जीवन शैली। यह वही जीवन शैली है जो पूरे विश्व के निवासियों को एक कुटुंब तो मानती है लेकिन जीने का तरीका ऐसा कि प्रत्येक प्राणी सुरक्षित रहे, प्रसन्न रहे, निरोग रहे और दीर्घजीवी हो।

इस समय संसार में जो समस्याएं हैं उनका सबका समाधान भारत के पास है। इसीलिए महात्मा गांधी ने 'स्वदेशी’ पर जोर दिया था जिसे आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने एक अभियान के रुप में लिया। लेकिन स्वदेशी का यह मंत्र भारत में उतना प्रभावशाली न हो सका जितना आज की जरुरत है। इसका कारण यह है कि भारत में जहां गांधीजी की प्रतिमा लगभग हर नगर के किसी न किसी चौराहे पर लगी है, उनके नाम पर बाजार है, सड़कें हैं। किताबों में जीवनियां हैं। नोटों पर छपी उनकी तस्वीर हर घर में है, हर जेब में है पर गांधीजी का स्वदेशी कहीं नहीं। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने राष्ट्र वैभव अभियान में स्वदेशी भाव और जीवन शैली को प्राथमिकता से लिया लेकिन वामपंथी, पश्चिमी शैली समर्थक बाजार और भयाक्रांत राजनीतिक धारााओं ने इतनी ताकत से विरोध आरंभ किया कि यह अभियान जन-अभियान का रुप न ले पाया। यदि यह होता तो आज कोरोना का वायरस घुस भी नहीं पाता।

'स्वदेशीÓ केवल वस्त्रों, भाषा या भोजन तक सीमित नहीं है यह प्रकृति के अनुरुप जीवन जीने की एक कला है। जिसमें प्रकृति के पांचों तत्वों धरती, जल, अग्रि, आकाश और वायु को शुद्ध रखना पहली प्राथमिकता है। फिर जीवन और फिर भोजन। अब देखिए कोरोना पैदा कहां से हुआ। यह मांसाहार से हुआ ऐसे जीवों को आहार बनाने से हुआ जो पूरी तरह 'अभक्ष्य’ है और फैला कैसे, हाथ मिलाने से फैला। यह वायरस रोगी की नाक, आंख से रिसने वाले पानी और मुंह के गीलेपन से फैलता है। प्रत्येक व्यक्ति का हाथ दिनभर में अनेक बार मुंह पर, नाक पर और आंखों पर आ जाता है। जो हाथ मिलाने से दूसरे में जाता है। हाथ मिलाने के अतिरिक्त प्रभावित व्यक्ति की छींक और खांसी से वायरस हवा में आता है जहो श्वांस से दूसरे के भीतर चला जाता है।

स्वदेशी जीवन शैली में शाकाहार पर जोर दिया गया है। शाकाहार पर यह जोर किसी फैशन के कारण नहीं अपितु मानव शरीर की रचना के आधार पर जोर दिया है। जैसे प्रकृति में दो प्रकार के प्राणी एक मांसाहारी, दूसरे शाकाहारी। मांसाहारी जैसे शेर, भेडिय़ा, शाकाहारी जैसे गाय-बकरी आदि। मांसाहारी प्राणियों की आंतें छोटी होती हैं, उनकी तुलना में शाकाहारी प्राणियों की आंतें तीन गुना बड़ी। मांसाहारी प्राणियों की आंते सीधी होती है जबकि शाकाहारी की घुमावधार। प्रत्येक प्राणी की आंतों से एक रसायन रिसता है जो भोजन को पचाता है। शाकाहारी प्राणी की आंतों से जो रसायन रिसता है इसकी तुलना में मांसाहारी बीस गुना तीखा होता है। बिल्कुल तेजाब की तरह। मनुष्य की आंतें भी घुमावदार और लंबी होती हंै ताकि फलों, अन्न, सब्जी का पूरा रस शरीर को मिल सके। यदि इन आंतों से मांस होकर निकलेगा तो वह ज्यादा देर आंतों में रहेगा जो न केवल बीमारियों की आशंका उत्पन्न करता है अपितु सोचने की शैली को भी अनुदार और क्रूर बनाता है। यह अंतर हम अपने आसपास ही उन दो व्यक्तियों की तुलना करके देख सकते हैं जिनमें एक शाकाहारी है और दूसरा मांसाहारी। यदि दुनिया शाकाहारी होती तो यह वायरस पैदा ही न होता।

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दूसरा भारत में मिलने के लिए हाथ जोड़कर नमस्ते करने या हाथ जोड़कर सिर झुकाकर नमस्कार करने की परंपरा है यदि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से हाथ जोड़कर नमस्ते करे तो यह बीमारी फैले ही नहीं। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वायरस से बचाव की अपील में नमस्ते को महत्वपूर्ण बताया। पूरी दुनिया ने बीमारियों से जूझते और उन पर रिसर्च करते करते थक जाने के बाद भारत के 'योगÓ को स्वीकार किया कि यह बीमारियों को ही जन्म नहीं लेने देता और आज माना कि हाथ जोड़कर नमस्ते करना हाथ मिलाने से कितना सुरक्षित है।

वस्तुत: भारत का स्वदेशी चिंतन समस्या आने के बाद के समाधान पर तो जोर देता ही है लेकिन उससे पहले इस बात पर जोर देता है कि दिनचर्या ऐसी हो, जीवन शैली ऐसी हो जो समस्याएं पैदा ही न करें। इसलिए विदेशी रिसर्च समस्या पर शोध होती है और भारतीय चिंतन निरापद जीवन का चिंतन है। भारतीय ऋषि परंपरा के इस चिंतन ने गांधीजी पर जोर दिया जो उनके तमाम लेखों में झलकता है। गांधीजी ने स्वदेशी पर न केवल लेख लिखे, व्याख्यान दिए बल्कि स्वदेशी आंदोलन भी चलाया। प्रतीक के रुप में विदेशी वस्त्रों की होली भी जलाई। इसी बात को आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने विभिन्न प्रकल्पों में स्वदेशी जीवन शैली पर जोर दिया। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 'स्वदेशी जागरण मंचÓ एक प्रकोष्ठ गठित किया जिसमें लोगों में स्वदेशी भाव जागरण का काम होता है। अब भारतीय समाज जीवन में ऋषियों के अनुसंधान से उत्पन्न शैली हो, गांधीजी के आंदोलन के सूत्र हों अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अभियान कि भारत में स्वदेशी-भाव है जिससे कोरोना वायरस उतना नहीं फैल पाया जितना दुनिया के अन्य देशों में फैला।