नेहरू-गांधी परिवार को चीन से प्रेम क्यों है ?

दिंनाक: 11 Sep 2020 14:23:56

    मृदुल त्यागी   

 

चीन के साथ कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार का क्या रिश्ता है? 2007 में राहुल गांधी ने चीन के साथ कैसा समझौता किया था? इस परिवार में नेहरू से लेकर राहुल तक सभी की भूमिका संदिग्ध रही है। चीन के प्रति इस परिवार का प्रेम इतना अधिक है कि वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है

 
चीन के साथ कांग्रेस का गठजोड़ नया नहीं है। यह पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पूरी दुनिया में चीन की पैरोकारी, उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने के दौर से चला आ रहा है। आज भी देश चीन के साथ युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, लेकिन कांग्रेस, खासतौर पर राहुल गांधी चीन के प्रवक्ता बने हुए हैं और देश का मनोबल गिराने की कोशिश कर रहे हैं। वह ‘ग्रेट वॉल ऑफ द पीपल’ में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हुए कांग्रेस के समझौते का हक अदा कर रहे हैं। उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी तो अरुणाचल प्रदेश के तवांग को थाली में परोसकर चीन के सुपुर्द करने को तैयार थे।


आज का चीन नाना की देन


जब चीन सीमा पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे, तब सेना प्रमुख जनरल करियप्पा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को बताया था कि पड़ोसी देश भारत पर हमले की तैयारी कर रहा है। लेकिन नेहरू उल्टे सेना प्रमुख पर ही फट पड़े और कहा, ‘यह कमांडर इन चीफ का काम नहीं है कि वह प्रधानमंत्री को बताए कि हम पर कहां से कौन हमला करने वाला है। चीन तो नेफा सीमा पर हमारी हिफाजत करेगा। तुम कश्मीर और पाकिस्तान पर ध्यान दो।’ नेहरू की यह बात 1962 के युद्ध में चीन से हमारी हार की सच्चाई बयान करती है। साथ ही, यह दशार्ता है कि नेहरू चीन के पिट्ठू थे। इसलिए चीनी सैनिकों के सामने भारतीय फौज को मरने के लिए छोड़ दिया था। हमारे वीर सैनिक बिना गोला-बारूद आखिरी सांस तक खुखरी से ही लड़े। 20 अक्तूबर, 1962 को जब चीन ने भारत पर हमला किया तो नेहरू की स्थिति ठीक वैसी थी, जैसे बिल्ली को देखकर कबूतर आंख बंद कर लेता है। नेहरू ने तो उसी समय आंखें बंद कर ली थीं, जब चीन ने तिब्बत को हड़पना शुरू किया था। चीन जब हमारी छाती पर आ चढ़ा था, तब नेहरू दिल्ली में माओ के साथ दोस्ती के सपने सजा रहे थे। लेकिन इस दोस्ती का नतीजा क्या हुआ, वह सभी को मालूम है। इस युद्ध में चीन के 80,000 सैनिकों और तोपखानों का मुकाबला भारत के मात्र 10,000 जवान कर रहे थे, जिनके पास न तो रसद सामग्री थी और न ही गोला-बारूद। एक माह बाद 21 लवंबर को चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की। अगर चीन चाहता तो आसानी से दिल्ली तक पहुंच सकता था। नेहरू कहते थे, ‘हमें किसी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की क्या जरूरत है? हम तो अहिंसा के सिद्धांत को मानते हैं। हमें सेना की जरूरत नहीं है। इसलिए सेना को खत्म कर देना चाहिए।’ उधर, चीनी तानाशाह माओ का कहना था कि तिब्बत हथेली है और लद्दाख, सिक्किम, नेपाल, भूटान और नेफा उसकी पांच उंगलियां हैं। यानी माओ इन इलाकों पर दावा जताते हुए इन्हें हड़पने की नीति पर काम कर रहा था। कम्युनिस्टों के प्रेम में नेहरू इतने अंधे थे कि उन्हें सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर चीन में भीषण नरसंहार तक नहीं दिख रहा था। चीन जब पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ा हुआ था, तब नेहरू ही थे जो गुट निरपेक्ष आंदोलन की आड़ में दुनिया हर मंच पर चीन की वकालत कर रहे थे। जापान की शांति संधि में भारत केवल इसलिए शामिल नहीं हुआ, क्योंकि उसमें चीन को बुलाया गया था।

 

नाना के नक्शे कदम पर नाती


राजीव गांधी भी नेहरू की तरह वैश्विक नेता बनने की खुशफहमी में रहे। ऐसी इच्छा रखने वाला हर नेता सबसे पहले वामपंथ शासित देशों का रुख करता है। राजीव गांधी ने भी वही किया। अटल बिहारी वाजपेयी, प्रणब मुखर्जी और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे दिग्गज नेताओं के विरोध के बावजूद उन्होंने चीन के साथ समझौता किया। नेहरू की ही तरह सपनों में जीने वाले राजीव का कहना था कि भारत कुछ किलोमीटर जमीन के बदले चीन के साथ शांति स्थापित कर सकता है। इसी सपने के साथ 19 दिसंबर, 1988 को बीजिंग पहुंच कर उन्होंने घोषणा की, ‘मैं पुरानी मित्रता को फिर से जीवंत बनाने के लिए यहां आया हूं।’ चीन के चालाक वातार्कार राजनीतिक और कूटनीतिक, दोनों ही मोर्चों पर उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद हमेशा के लिए सुलझ सकता है। बशर्ते भारत अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र पर चीन के दावे को स्वीकार कर ले। दरअसल, चीन यह मानता है कि अरुणाचल प्रदेश दक्षिणी तिब्बत है। चीन की ओर से राजीव गांधी को यह घुट्टी पिलाई गई कि अगर भारत पूर्वी मोर्चे पर चीन का दखल मान लेता है तो बाकी जगहों पर वह भारतीय चिंताओं का ख्याल रखेगा। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन, जो उस समय सीमा विवाद से जुड़ी वार्ताओं में भारत के विशेष प्रतिनिधि थे, ने अपनी किताब ‘च्वाइेज: इनसाइड द मेकिंग आफ इंडियाज फॉरन पॉलिसी’ में लिखा है, ‘1985 में चीन ने साफतौर पर कहा कि वह पूर्व में अरुणाचल का तवांग इलाका चाहता है। हालांकि भारत में किसी भी सरकार के लिए इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल था, क्योंकि तवांग पूरी तरह भारतीय क्षेत्र है। 1956 में सर्वोच्च न्यायालय भी बेरूबाड़ी मामले में फैसला दे चुका था कि सरकार किसी अन्य देश की सरकार के साथ अपने संप्रभु क्षेत्र पर समझौता नहीं कर सकती। इसके लिए संवैधानिक संशोधन करना होगा। इसलिए चीन की नाजायज मांग पर विपक्ष के नेताओं से बातचीत करना राजीव गांधी की मजबूरी थी।
कुछ चीनी पिट्ठू और वामपंथी को छोड़कर राजीव गांधी का समर्थन किसी ने नहीं किया। उस समय कांग्रेस से निष्कासित प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि वह राजीव गांधी की आत्मसमर्पण नीति का विरोध अरुणाचल जाकर करेंगे। जनता पार्टी ने भी मैकमोहन रेखा पर संदेह जताने के लिए राजीव को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि यह किसी छोटे से नक्शे पर खींची गई मोटी लकीर नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जिसका चीन ने उल्लंघन किया है। उस समय संसदीय मामलों की सलाहकार समिति के सदस्य अटल बिहारी वाजपेयी ने और भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि विदेश मंत्री ने समिति की बेहद महत्वपूर्ण बैठक इसलिए रद्द कर दी, क्योंकि सरकार को सूचना मिली थी कि चीन अरुणाचल प्रदेश पर हमला करने वाला था। इन्हीं कारणों से चीन के साथ समझौते पर आम राय बनाने का राजीव गांधी का प्रयास नाकाम रहा। बाद में वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में अरुणाचल मुद्दे पर चीन के प्रस्ताव पर दो टूक कहा था कि यह न तो व्यवहारिक है और न ही संभव है। यही नहीं, जवाब में उन्होंने चीन से अक्साई चिन मांग लिया था।

 

अब राहुल का चीन से गुप्त समझौता


7 अगस्त, 2008 को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने बीजिंग में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विभाग के मंत्री के साथ एक गोपनीय समझौते पर हस्ताक्षर किए। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन उप राष्ट्रपति शी जिनपिंग मौजूद थे। यह स्वयं में एक अनूठा मामला है कि देश का एक राजनीतिक दल चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से समझौता करता है। समझौते में क्या है, इस पर आज तक कांग्रेस ने कुछ नहीं बताया। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इस पर टिप्पणी की कि देश का कोई दल इस तरह का समझौता कैसे कर सकता है? सवाल है कि क्या नेहरू-गांधी परिवार के खून में ही चीन की गुलामी है? क्या यह परिवार चीन के लिए कुछ भी कर सकता है? यह परिवार सैनिकों के बलिदान पर सवाल उठाता है। सेना के शौर्य पर सवाल उठाता है। यही परिवार देश के कम्युनिस्टों से दो कदम आगे बढ़कर चीन के सुर में सुर मिलाता है। नेहरू से राहुल तक कोई तो डोर है, जिसके सहारे बीजिंग में बैठा तानाशाह नेहरू-गांधी परिवार को कठपुतली की तरह नचाता है।


( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

 सन्दर्भ - पांचजन्य