प्राचीनकाल से ही पर्यावरण के प्रति सचेत करने का विधान रहा है ‘प्रकृति वंदन’

दिंनाक: 15 Sep 2020 14:16:43

 

 


       

   - सुदर्शन व्यास   

 

सनातन परंपरा में संध्या वंदन का सार्वाधिक महत्व है। विद्वानों के मुताबिक त्रिकाल संध्या कर्म करने वाला व्यक्ति प्रकृति और ईश्वर के निकट रहता है। हमारी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता, प्राचीन इतिहास आदि का ज्ञान भी अपने प्राचीन और वैज्ञानिक शास्त्रों से ही प्राप्त हुए है, हमारे ग्रंथों में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। यही कारण है कि धर्मशास्त्रों में पर्यावरण चेतना के स्वर बार-बार मुखरित होते हैं। फिर चाहे हम वेदों, उपनिषदों की बात करें तो उनमें सभी ग्रहों, नक्षत्रों समेत सूर्य, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश, नदी, पर्वत और वनस्पतियों को देवों का स्थान प्राप्त है। सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में इन सबकी स्तुतियां भी की गई हैं। शास्त्रों के मुताबिक जल के देव वरुण हैं, अग्नि देव, पवन देव समेत सभी गृहों का वर्णन हैं जिनके राजा  इंद्र कहलाते हैं। इतना ही नहीं बरगद, पीपल, नीम, आंवला, तुलसी, दौना आदि पेड़े-पौधे ईश्वर की भांति पूजित हैं। इनकी महिमा का गान हर धर्मशास्त्र करता है। वहीं हम नदियों को पवित्र मानकर उनकी भी पूजा करते हैं। कुंभ, पूर्णिमा, अमावश्या, एकादशी या बिहार में मनाया जाने वाला छठ पर्व समेत स्नान पर्वों पर करोड़ों की संख्या में लोग गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, महानदी में पुण्य स्नान करते हैं।

            

             हमारे धर्म शास्त्रों में प्रकृति को देवतुल्य कहने का मूल आशय यह है कि मानव समाज इसका संरक्षण व संवर्धन करे, क्योंकि प्रकृति सुरक्षित रहेगी तो जीवन सुरक्षित रह सकेगा। इसका एक कारण यह भी है कि भारत में भावना प्रधान लोग निवास करते हैं। यूं तो प्रकृति संरक्षण के लिये समूचे जगत में कई आंदोलन, आयोजन और अभियान संचालित हैं, लेकिन उन आयोजनों में एक स्वार्थ छिपा है। वे कहतेभर हैं कि हम प्रकृति से प्रेम करते हैं लेकिन उस तथाकथित प्रेम के पीछे प्रकृति का दोहन होता है। इसी के उलट हिन्दु धर्मशास्त्रों में हम प्रकृति से सिर्फ प्रेम नहीं करते बल्कि उसे देवतुल्य मानकर श्रृद्धाभाव से पूजते हैं। भारतीय परंपरा और संस्कृति में प्रकृति पूजन रचीबसी है। हमारे हर त्यौहार में प्रकृति वंदन की महत्ता है। यह परंपरा अविरल रहे इसी भावना को जाग्रत रखने के लिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पर्यावरण संरक्षण गतिविधि एवं हिन्दू अध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान के संयुक्त तत्वाधान में 30 अगस्त 2020 को प्रकृति वंदन कार्यक्रम विश्वभर में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम की बड़ी बात यह थी कि समूचे विश्वभर के कई प्रमुख साधु – संत, सामाजिक संस्थाएं, प्रकृति प्रेमी एवं प्रबुद्धजनों ने कोरोना संक्रमणकाल में वर्चुअल रूप से भी भाग लिया। लोगों ने अपने – अपने घरों में प्रकृति के अवयवों (पेड़ – पौधे, नदी, जल, अग्नि) आदि का पूजन और वंदन कर उन्हें न सिर्फ धन्यवाद ज्ञापित किया बल्कि प्रकृति के संवर्धन और संरक्षण का संकल्प भी लिया।
            

          हम भारत के हृदयप्रदेश यानि मध्यप्रदेश की ही बात करें तो प्रकृति वंदन कार्यक्रम में कुल 89 हज़ार 343 लोगों ने ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन करवाया था। यह आयोजन मध्यप्रदेश की लगभग सभी तहसील स्तर पर आयोजित हुआ। मुख्य रूप से 412 शहरों में इसका आयोजन हुआ था। चाहे जूनापीठाधीश्वर, महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द जी की बात करें या अध्यात्म संत श्री श्री रविशंकर जी की हो, या फिर स्वामी चिदानन्दमुनी जी हों। संत परंपरा के सशक्त हस्ताक्षरों ने इस आयोजन से जुड़ने के लिये लोगों से आग्रह किया था। वहीं मध्यप्रदेश में लगभग 30 बड़े पूज्यनीय संतजन भी इस आयोजन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे। इसके साथ ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत कई राजनीतिक हस्तियों, इंडियन इंस्टीट्यूड ऑफ मैनेजमेंट के डायरेक्टर, उद्योगपति समेत अनेक प्रबुद्ध जनों ने भी इस आयोजन में अपने घरों या कर्मक्षेत्र में प्रकृति पूजन कार्यक्रम में भाग लिया था। एक विस्तृत आंकड़ों यदि हम देखें तो मध्यप्रदेश में तकरीबन 1 लाख 20 हज़ार से अधिक परिवारों ने प्रकृति वंदन कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, यानि 4 लाख 48 हज़ार लोग (आकड़ों के मुताबिक प्रति परिवार से 4 सदस्य) इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे। मध्यप्रदेश की 180 सामाजिक, धार्मिक, स्वयंसेवी, प्रकृति संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं ने इस आयोजन को पूर्ण कराने की जिम्मेदारी ली थी। कोरोना संक्रमण के कारण इस आयोजन से वर्चुअली जुड़ने के लिये हिन्दू अध्यात्मिक एवं सेवा फाउण्डेशन द्वारा फेसबुक पेज भी बनाया गया था, जिससे जुड़ने के लिये लोगों से अपील की गई थी। संस्थान के इस पेज से 29 हज़ार 147 से अधिक लोग लाईव जुड़े थे। इस तरह प्रदेश में सोशल मीडिया के 5 विभिन्न पेज (पटल) पर यह आयोजन लाईव किया गया था, इस तरह कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में 1 करोड़ लोगों ने इस महनीय आयोजन में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित होकर अपनी उपस्थिती दर्ज कराई थी। ये उपस्थिती इस बात का प्रमाण भी थी कि पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के लिये हम कितने सचेत और गंभीर हैं।

 

लोकल को ग्लोबल बनाने हेतु प्रयासरत केंद्र सरकार

       

           यदि हम धर्मग्रंथों के प्रमाण और वैज्ञानिक पद्धति की बात करें तो त्रेतायुग का वर्णन करने वाला प्रमुख धर्म-ग्रंथ रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस तो जैसे पर्यावरण चेतना के ही ग्रंथ हैं। इनमें बार-बार प्रकृति से जीवन स्थापित होते देखा जाता है। प्राचीन काल में मनुष्य का अधिकांश जीवन वनों के संसर्ग में ही व्यतीत होता था। अर्थात् सनातन धर्म की आश्रम परंपरा में देखें तो आयु के प्रथम 25 वर्ष ब्रह्चर्याश्रम, वनों में घूमते, पेड़-पौधे लगाते, फल-फूलों पर जीवन-निर्वाह करते, गुरू से शिक्षा प्राप्त करते व्यतीत होते, बाद में 25 वर्ष भी शास्त्र लेखन, आश्रम संचालन, प्रकृति रक्षण में व्यतीत होते थे, तपस्या वनों में, सजा वनों में, शिक्षा वनों में अर्थात् मानव-जीवन और प्रकृति को अलग-अलग करके देखना असंभव जैसा ही था। इतना ही नहीं प्राचीनकाल में राजा अपने राज-पाठ को त्याग वन में ही तपस्या के लिये प्रस्थान करते थे। आज भी वनों की इसीलिए बड़ी महत्ता है क्योंकि वनों प्रकृति रूप में साक्षात् देवता निवास करते हैं।

 

श्रीरामचरित मानस के एक प्रसंग पर हम दृष्टि डालें तो देखेंगे कि राजा जनक की पुष्पवाटिका सीता-राम के प्रथम दर्शन का कारण बनी, श्रीराम अपने गुरू की पूजा हेतु पुष्प चयन करने आए थे, सीताजी भवानी पूजन हेतु सखियों के साथ पधारी थीं।

भगवान श्रीराम ने देखा कि...

लागे विटप मनोहर नाना, बरन-बरन बर बेलिबिताना।
नव पल्लव फल सुमन सुहाए, निज संपत्ति सुर रुख लजाए।।
चातक कोकिल कीर चकोरा, कूंजत विहक नटत कल मोरा।
मध्य बाग सरू सोह सुहावा, मनि सोपान विचित्र बनावा।।

विमल सलिलु सरसिज बहुरंगा, जल खग, कूंजत गुंजत भृंगा-सखि मुख से श्रीराम-लक्ष्मण की शोभा का वर्णन सुन सीताजी दर्शन हेतु अधीर हो जाती हैं, तब का प्रकृति चित्रण-

लता भवन ते प्रगट भे ते ही अवसर दोऊं भाई।
निकसे जनु जुग विबुध विधु जलद पटल बिगलाई।।

चित्रकूट में हो अथवा पंचवटी में, जहां-जहां राम ने पर्णकुटि बनाई, लक्ष्मण, सीता ने पेड़-पौधे, फुलवारी लगाई और उनका संरक्षण किया। नदी से जल लाकर स्वयं जनकनंदिनी अपनी वाटिका का सिंचन करती थीं। श्रीराम ने पर्यावरण के अभिन्न अंग जीव-जंतुओं से भी आत्मीयता का व्यवहार किया।

        

            कुछ इसी तरह यदि हम द्वापर युग की बात करें तो भगवान श्री कृष्ण ने बाल्यकाल में गेंद के बहाने कालीदह में कूदकर अपने विष से यमुना जल को प्रदूषित करने वाले कालियानाग का दमन किया। यह जल शोधन का उदाहरण है। कदंब की डाल, करील की झाड़ियां, फूल-पत्तों का सिंगार, रासलीला, यमुना-स्नान आदि सभी प्रकरण पर्यावरण के प्रति व्यक्तियों को सचेत करते हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात् पांडवों द्वारा अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन वास्तव में वायु शोधन का उपक्रम था। इतना ही नहीं कार्तिक माह में प्रातः स्नान कर तुलसी की पूजा करने वाली पटरानी सत्यभामा के आंगन में ही स्वर्ग के नंदन कानन से जीतकर लाया गया पारिजात वृक्ष लगाया गया था, ये कुछ उदाहरण हैं कि धर्मशास्त्रों का हर पृष्ठ पर्यावरण चेतना का संदेश देता है। कहा तो यह भी जाता है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान होता है।

             पीपल के वृक्ष में मूल ब्रह्मा, तना विष्णु, पत्रे देव महेश्वर बताए गए हैं, अब तो सिद्ध हो गया है कि पीपल की ऊंची शाखाएं बादलों को अपने में उलझाकर वर्षा में सहायक होती हैं। ऑक्सीजन निर्माण, शीतल छाया, पक्षियों का आश्रय, पथिकों को विश्रांति देने वाला पीपल वृक्ष पूजा का आश्रय है, उसे कौन नहीं बचाएगा। इसी प्रकार नीम, तुलसी एवं आंवले की उपयोगिता कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं है। पंच महायज्ञों के माध्यम से जन-जन में पर्यावरण चेतना का विकास किया गया है। पूजा की वस्तुएं वस्तुतः पर्यावरण सुरक्षा का ही माध्यम हैं। फूल, पत्ते, मौसमी फल, दुर्वा इनकी आवश्यकता के मद्देनजर इन्हें लगाया भी जाएगा। दुर्वा भू-क्षरण रोकने का सशक्त माध्यम है, पत्र-पुष्पों से वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा संतुलित रहती है। शुद्ध जल ही देवता को चढ़ाया जाता है। नदियों की भी पत्र-पुष्प, दुग्ध, अक्षत आदि से पूजा की जाती है, इन्हें खाकर जलचर अपने जीवन-निर्वाह के साथ जल-शोधन भी करते हैं। कुल मिलाकर इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने धर्म द्वारा लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत करने का सफल विधान रचा है, प्रकृति वंदन इसी का प्रबल उदाहरण ही तो है।