सनातन परंपरा के संतों में सहज, सरल और तपोनिष्ठ स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि

दिंनाक: 19 Sep 2020 14:29:41


पथ-प्रदर्शक, अध्यात्म-चेतना के प्रतीक, तपो व ब्रह्मनिष्ठ, विश्व प्रसिद्ध भारत माता मंदिर के संस्थापक महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि का जन्म आज ही के दिन 19 सितंबर, 1932 को आगरा में हुआ था। सनातन परंपरा के संतों में सहज, सरल और तपोनिष्ठ स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि का नाम उन संतों में लिया जाता है, जिनके आगे कोई भी पद या पुरस्कार छोटे पड़ जाते हैं। तन, मन और वचन से परोपकारी संत सत्यमित्रानंद आध्यात्मिक चेतना के धनी थे। उनके पिता का नाम शिव शंकर पांडेय और माता का नाम त्रिवेणी देवी था। उनके जन्मदिन के अवसर पर राची रैकवार द्वारा स्वामी जी के करीबी व्यक्तियों से चर्चा की गई।

स्वामी सत्यमित्रानंद जी से शिक्षा लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ: शर्मा

पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा कहते हैं कि भारत माता मंदिर के संस्थापक परम पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद जी से शिक्षा लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे सच्चे पथ-प्रदर्शक, गहन तपस्वी होने के साथ ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक थे। स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि बचपन से ही संन्यास और अध्यात्म में रुचि रखते थे। यही कारण है कि उन्होंने बहुत कम उम्र में ही संयास ले लिया था। संन्यास लेने से पहले स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि अंबिका प्रसाद पांडेय के नाम से जाने जाते थे। उनके पिता शिवशंकर पांडेय को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गिरते सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा उनके जीवन का संकल्प था। वे अध्यात्म की सुदृढ़ परंपरा के संवाहक तो थे ही महान् विचारक एवं राष्ट्रनायक भी थे। मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका आशीर्वाद मिला। उनका जीवन हमें नि:स्वार्थ भाव से समाज सेवा की प्रेरणा देता है।

स्वामी जी बोले 'आप तो हमें घर का बना भोजन दे दीजिए: पंत मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति मंत्री संचालक कैलाशचंद्र पंत ने कहा कि भारत मां के परम आराधक, निवृत्त-जगद्गुरु शंकराचार्य, पद्मभूषण, पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी के जन्मदिन पर मैं उनको नमन करता हूं। हमने उनके आयोजन भोपाल मे भी करवाएं हैं, वे बहुत सरल स्वभाव के थे। जब वो ट्रेन से वापस जा रहे थे तो हमें बहुत संकोच हो रहा था कि इतने महान सन्यासी के लिए कैसे क्या भोजन की व्यवस्था करें तो स्वामी जी बोले 'आप तो हमें घर का बना भोजन दे दीजिए, मै ले जाता हूं। स्वामीजी ने सन्यासी जीवन की सार्थकता सिद्ध कर अपना सारा जीवन दीन-दुखी, गिरिवासी, वनवासी, हरिजनों की सेवा और सांप्रदायिक मतभेदों को दूर करने, समन्वय-भावना का विश्व में प्रसार करने में लगा दिया।

युवा पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत स्वामी जी: शर्मा

दीपक शर्मा कहते हैं कि स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज मां भारती के एक सच्चे उपासक थे। हरिद्वार का भारत माता मंदिर जिसका परिचायक है। भारत माता मन्दिर में विभिन्न तलों पर भारत के महान् पुरुषों, नारियों, क्रांतिकारियों, समाजसेवियों आदि की प्रतिमाएं लगी हैं। इनको देखते हुए दर्शक जब सबसे नीचे आता है, तो वहां अखण्ड भारत के मानचित्र के आगे सुजलाम, सुफलाम् भारत माता की विराट मूर्ति के दर्शन कर वह अभिभूत हो उठता है। उनके विचार, ज्ञान और दर्शन आने वाली पीढिय़ों को धर्म और राष्ट्र सेवा के लिए सदैव प्रेरित करते रहेंगे। युवा भारत की परंपराओं को समझे और उनसे प्रेरणा ले जिससे उनका भविष्य सही दिशा मे बढ़े।

स्वामी जी से सीखे त्याग औऱ सेवा भाव: सांघी

अधिवक्ता ब्रज किशोर सांघी ने स्वामी जी की भूमिका का वर्णन करते हुए कहा कि स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी की भारत के संतों, महामनीषियों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनका जन्म 19 सितंबर 1932, में आगरा के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शिव शंकर पांडेय और माता का नाम त्रिवेणी देवी था। मात्र 26 वर्ष की आयु में भानपुरा पीठ का शंकराचार्य बना दिया गया। स्वामी सदानंद जी महाराज ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी। करीब नौ वर्ष तक धर्म और मानव के निमित्त सेवा कार्य करने के बाद उन्होंने 1969 में जिस दण्ड को धारण करने मात्र से ही 'नरो नारायणो भवेत का ज्ञान हो जाता है, उसे गंगा में विसर्जित कर दिया। हम सभी को स्वामी जी से प्रेरणा लेना चाहिए और अपने जीवन मे उनके ज्ञान का प्रयोग कर जीवन सफल बनायें।

साभार - स्वदेश