दुनिया को पूंजीवाद या साम्यवाद नहीं, बल्कि मानववाद की जरूरत है-दीनदयाल जी

दिंनाक: 25 Sep 2020 13:51:50
किसी भी देश के चिंतक अथवा विचारक उस मानव समाज के अभिभावक स्वरूप होते हैं,जो समाज में मार्गदर्शन का कार्य करते हैं.भारत में ऐसे विचारकों की एक लम्बी श्रृंखला है .इन्हीं में से एक नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय का है,जिनके विचारों में समाज के सभी पक्षों को मजबूती देने की ताकत है.
 
आज का दिन यानी 25 सितंबर इतिहास के पन्नों में काफी अहमियत रखता है. आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती है। वर्ष 1916 में आज ही के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक और जनसंघ के सह-संस्थापक पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म मथुरा में हुआ था. उन्होंने देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी और कहा कि दुनिया को पूंजीवाद या साम्यवाद नहीं, बल्कि मानववाद की जरूरत है। 
 
उनका पूरा जीवन युवाओं के लिए सीख है कि त्याग और बलिदान की भावना से कैसे देश और समाज से प्रेम किया जा सकता,सेवा की जा सकती है, आत्म गौरवपूर्ण जीवन के साथ समाज का संवाहक बना जा सकता है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन उसका अप्रतिम उदाहरण है.
 
दीनदयाल उपाध्याय जी के संघर्षपूर्ण जीवन की शुरुआत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिले संस्कारों के बदौलत उनमें जो निः स्वार्थ सेवा भाव की प्रबल भावना जागृत हुई,उसका समाज को सीधा लाभ मिला। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने पत्रकारीय समझ के साथ 'राष्ट्रधर्म' ,'पाञ्चजन्य' और 'ऑर्गनाइजर' जैसे राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत पत्रिकाओं का कुशल संचालन का कार्यभार संभाला और देश को अपने प्रगतिशील बौद्धिकता से परिचित कराया। दरअसल वे पत्रकारों के पत्रकार एवं सम्पादकों के संपादक थे। उन्होंने भले ही किसी पत्र- पत्रिकाओं का संपादन नहीं किया लेकिन उनके ही कुशल मार्गदर्शन में राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत कई पत्र- पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ।  लखनऊ से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्रिका 'राष्ट्रधर्म' के सम्पादन की जिम्मेदारी अटल बिहारी बाजपेयी सरीखे पत्रकार को दी गयी।बाजपेयी जी और राजीवलोचन अग्निहोत्री के साथ शुरू की गयी पत्रकारीय यात्रा ने ''राष्ट्रधर्म' को नया मुकाम स्थापित किया। 
 
दीनदयाल जी भारतीय भाषाओँ को भारत के विकास और प्रभाव का मार्ग मानते थे। वे भाषा के संवर्धन के सवाल पर कहते है; सरकारी संरक्षण में कोई भी भाषा विकास नहीं कर सकती है। वे सभी भारतीय भाषाओ के विकास के प्रबल पक्षधर थे। 
 

एकात्म मानववाद 

दीनदयाल उपाध्याय जी बहुआयामी महामानव थे। वे सिर्फ एक राजनेता ही नहीं बल्कि महान चिंतक, विचारक और संगठनकर्ता भी थे। वे पूर्णतया भारतीयता और भारतीय संस्कृति के उपासक थे। उन्होंने एकात्म मानववाद के अद्भुत विचार से राष्ट्र के विचार की आधारशिला रखते हुए विदेशी विचारों से आक्रांत भारतीय राजनीति को उसकी माटी से महक से जुड़ा हुआ विचार दिया । दरअसल उन्होंने भारत की सनातन विचार को ही युगानुकूल प्रस्तुत करते हुए एकात्मकता का अद्भुत मन्त्र दिया। 
 
पंडितजी का एकात्म मानव दर्शन भारतीय संस्कृति और ऋषि परम्परा की जड़ता से ही निकला हुआ वट वृक्ष है.   एकात्म मानव दर्शन के माध्यम से उन्होंने बड़ी सहजता से किसी व्यक्ति से राष्ट्र तक के उसके सम्बन्ध को परिभाषित किया है। व्यष्टि से समष्टि एवं उसमें अन्तर्निहित राष्ट्र की चेतना को एकात्म मानव दर्शन के समग्र चिंतन में स्पष्ट किया गया है। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है कि; शारीरिक आत्मा की तरह राष्ट्र की भी आत्मा होती है, जो कभी खत्म नहीं होती। राष्ट्र की इस चेतनामयी आत्मशक्ति को उन्होंने चिती के नाम से सम्बोधित किया। अर्थात, आत्मा की तरह राष्ट्र का अमरत्व तत्व भी अखण्डित है तथा राष्ट्र रूपी देह के रक्षण, संरक्षण, संवर्धन का दायित्व हर व्यक्ति का है जो समाज की मूलभूत इकाई है।
 

अंत्योदय से आत्मनिर्भरता की ओर ... 

दीनदयाल उपाध्याय जी की दृष्टि में भारत की अर्थनीति जीवन के मूलभूत आवश्यकताओं से जूझ रहे वंचित भारतीयों पर केंद्रित होनी चाहिए। उनका अंत्योदय का मंत्र आज के समय की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थिियों में परिवर्तन का कारक हो सकता है। सही मायने में अंत्योदय से ही आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो सकता है। 
देश की आजादी के बाद एक तरफ दीनदयाल उपाध्याय जी, मां- माटी और मनुष्य के जीवन की उन्नति की बात कर रहे थे, अंत्योदय से लेकर एकात्म मानववाद की बात कर रहे थे तो उसी दौर में दुराग्रही सोच वाले नेता भारत को हिंसात्मक साम्यवादी, और पूंजीवादी ढाँचे में ढालने की भरपूर साजिश रच कर रहे थे।
 
आज सामयिक मूल्यांकन करने का वक्त है । आज यह पता चलता है कि भारत की ज्यादातर सामाजिक, आर्थिक समस्याओं की जड़ता में गत सात दशकों का दुराग्रही विचार ही एक मात्र कारक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में वैचारिकता और नैतिकता का तेजी से पतन हुआ, अमीर व गरीब के बीच की खाई जितनी कम होनी चाहिए, उतनी नहीं हुई। यह आर्थिक विषमता हमारे चिन्ता का बड़ा कारण बनी हुई है। 
 
गत तीन दशकों में वैश्विकरण और उदारीकरण का एक लम्बा दौर गुजर गया है। उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में विकास के नाम पर जिस तेजी से व्यक्ति का चरित्र उपभोक्तावादी बना है, वह चिंतनीय है। शहरी, ग्रामीण असंतुलन ने देश के विकास को घुटनों पर बैठा दिया है और इसी असंतुलित विकास ने शहर की आधुनिकता तथा गांव के पिछडेपन की दरार को और चौड़ा कर दिया है। बदलाव के इस दौर ने शहर को सांस्कृतिक प्रकाश से अंधकार की तरफ धकेल दिया है, आधुनिक पाश्चात्य जीवनशैली ने हमारे शहरों को दूषित किया और आज हमारे गांव भी अपनी अस्मिता, अपनी धरोहर और संस्कृति बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है। 
 
दीनदयाल जी भारत की आत्मा से जुड़े हुए विचारक थे, वे भारत के मौलिक सिद्धांतों को जनता तक पहुँचाना चाहते थे। वे उस वक्त के सरकारों को समझाने की भरपूर कोशिश करते रहे कि भारत को विदेशी विचारों के अनुसरण से बचते हुए अपनी मूल भारतीय संस्कृति के विकास और विस्तार की और ध्यान देना चाहिए। यदि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात पंडित दीनदयालजी के विचारों को अपनाकर आगे बढ़ा गया होता तो निश्चित ही यह भारत के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी होता ।
 
पंडितजी ने ग्रामीण जीवनशैली का आधार खेती गृहस्थी को उन्नत बनाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इसके लिए दीनदयाल जी ने ‘हर खेत को पानी, हर हाथ को काम ’ का विचार दिया था। उनका चिंतन था- खेती लाभप्रद होगी, भण्डारण बाजार की उचित व्यवस्था होगी, तो गांव उन्नतिशील हो जाएंगे। गांव के लोग शहर की ओर पलायन नहीं करेंगे। तब बड़ी संख्या में हमारे युवा कृषि कार्य में लगेंगे।
 
आज केंद्र में एक ऐसी सरकार है जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों के अनुरूप सत्ता और समाज को साथ मिलाकर राष्ट्र को विकास की दिशा मे ले जाने का कार्य कर सकती है। केंद्र सरकार पिछले  छः वर्षों का कार्यकाल भारतीय जनता को आश्वस्त करता है कि दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों को प्रतिबद्धता से जमीनी स्तर पर फलीभूत करने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद के मंत्र को नए रूप में ढाल कर "सबका साथ सबका विश्वास" के सहारे अन्त्योदय की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए कई प्रयास कर रहे है ।
 
हाल ही में कृषि सुधार के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए है। सिंचाई क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। कृषि उपकरणों की खरीददारी में भारी छूट का प्रावधान किया गया है। बजट में कृषि की हिस्सेदारी पहले से ज्यादा की गई है। किसानों के सामर्थ्य एवं परिश्रम का सम्मान करने के लिए उन्हें हर वर्ष 12 हजार रूपए दिए जा रहे है । राष्ट्र के समग्र विकास में सत्ता और जनता की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए सरकार ने संकल्प के सहारे तय समयसीमा में किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य ले रखा है ।  
 
दीनदयाल जी के ही प्रेरणादाई विचारों से भारत आत्मनिर्भरता के साथ समग्र विकास कर सकता है। इसके पहले की सरकारों ने समाज को विकास में सहभागी बनाने की बजाय उन्हें उपभोक्तावादी, उपभोगवादी बनाने का काम किया। उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण कृषि व उद्योग व्यापार में अनावश्यक टकराव की स्थिति पैदा हो गई, ग्रामीण क्षेत्र में पलायनवादी दौर शुरू हुआ। आज समय की मांग है दीनदयाल जी की वैचारिक अवधारणा के अनुरूप सभी प्रकार के असंतुलन को संतुलित करने का प्रयास किया जाये। 
 

दुर्बलता के साथ किये हुए समझौतों का मूल्य नहीं होता ... 

चीन की विस्तारवादी नीतियों पर दीनदयाल उपाध्याय जी ने एक बार कहा - "चीन का जो रुख है उसमें उसकी भूख केवल अभी तक अधिकृत भूभाग से ही नहीं मिटने वाली, बल्कि वह उससे बहुत अधिक पर अपना दावा कर रहा है। पर यदि वह उतने से संतुष्ट हो जाए तो क्या हमें भी समझौता कर लेना चाहिए? स्पष्ट है, इसका अर्थ आक्रमण के सम्मुख आत्मसमर्पण होगा। उसका परिणाम हमारे पड़ोसी देशों पर भी पड़ सकता है। हमारे नेता चाहे ‘शांति’ के उच्च आदर्शोें से प्रेरित होकर यह समझौता करें, किन्तु विश्व तो उसे हमारी कमजोरी ही मानेगा। दुर्बलता के साथ किये हुए समझौतों का मूल्य नहीं होता। यदि हम समझौता भी चाहते हैं तो हमें अपने सामर्थ्य का प्रकटीकरण करना पड़ेगा। बिना उसके किया हुआ समझौता हमारी खोई हुई प्रतिष्ठा को और भी धक्का लगायेगा तथा एशिया के छोटे-छोटे राष्ट्र फिर या तो चीन की गोद में चले जाएंगे अथवा भय के कारण अमेरिका का सहारा खोजेंगे। 
 
पिछले कुछ दशकों से भारत के सामर्थ्य शक्ति को निस्तेज करने के भरपूर प्रयास किया गया, जिसका परिणित यह हुआ कि भारत को आज पुनः अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है । अब केंद्र में दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों वाली सरकार है, लिहाजा अब भारत के सामर्थ्य का प्रकटीकरण करना आवश्यक है ।
 

देश की मिट्टी का कण कण आभारी है ... 

 
अजातशत्रु पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जीवन में क्षमा, त्याग और बलिदान की प्रबल भावना थी.पंडित जी कइयों बार जब पारम्परिक धोती कुर्ता धारण किये घर से निकलते और वापस केवल गमछे लपेटे हुए आते थे. देश की गरीबी और गरीबों की वेदना उनके लिए असहनीय था। वे हर हाल में हर किसी की सेवा में लग जाना चाहते थे। उनका मांनना था की मैले कुचैले लोग ही भगवान् है और इनकी सेवा करना ही परम धरम है। वे गरीबों के आर्थिक उत्थान के सबसे बड़े पैरोकार थे। 
 
जनसेवक पंडित दीनदयाल का जीवन असहनीय दुखों, बाधाओं की चुनौतियों से दो चार होते ढृढ़ता और संकल्पता के साथ देश और समाज के उत्थान के लक्ष्य लिए चरम उत्कर्ष की कहानी है. भारतवर्ष की एकता,अखंडता के स्वप्न के सहारे गरीबों की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए राजनितिक पटल के दीप्तिमान सितारा दीन दयाल उपाध्याय  की संदिग्ध परिस्थितियों में 11 फरवरी 1968 की सर्द रातों में मुग़लसराय रेलवे स्टेशन पर हत्या कर दी गयी.
 
देश की आत्मा को करीब से जानने और महसूस करने वाले गरीबों के हितैषी दीनदयाल जी की हत्या संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई और दुर्भाग्य से विपक्ष के इस सच्चे जननायक की मौत भी राजनीतिक विमर्श का मुद्दा नहीं बन पाया .उन्होंने अपने मौलिक चिंतन, पत्रकारीय एवं सामाजिक जीवन भारतवर्ष को समर्पित किया.उनके महान त्याग, तप और संघर्षपूर्ण जीवन को यह राष्ट्र हमेशा याद रखेगा. देश की मिट्टी का कण कण उनके योगदान का आभारी है. दीन हीन की सेवा के साथ शुरू हुई उनके जीवन की कहानी में त्याग और बलिदान की भावना लिए देश प्रेम की प्रबल उत्कंठा से चलने की प्रेरणा लेना ही पंडित जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.