किसान केवल मुद्दा बनेंगे या उनकी मदद भी करेंगे

दिंनाक: 29 Sep 2020 16:44:44

 


     - शशांक शर्मा    

भारत मुद्दों का देश है, कोई न कोई मुद्दा जनता के हित और कल्याण के नाम पर राजनीतिक फ़लक में बना रहता है। यह बात अलग है कि संसद के भीतर, सड़क पर और मीडिया में हजारों - लाखों मुद्दों पर सवाल-जवाब होने और आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद देश की बुनियादी समस्याएं सुलझ नहीं पाई है। अब तो ऐसा लगता है कि किसी समूह कि रुचि समस्या सुलझाने में है ही नहीं बल्कि अपनी राजनीति चमकाने और बौद्धिक अहम की पूर्ति के लिए हंगामा होता आया है। सरकार का विरोध करके तो सालों देख लिया हालात नहीं बदलते, इस बार मिलकर सरकार की योजनानुसार किसानों और किसानी को मुद्दा न बनाकर उनकी मदद करें। देखें तो सही सरकार के दावों में कितना दम है?

 

आज देश में किसानों का मुद्दा छाया हुआ है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन अध्यादेशों को बीते संसद सत्र में कानून बना दिया है। इस कानून का किसान संगठन और राजनैतिक पार्टियां विरोध कर रही हैं। ऐसा प्रचार किया जा रहा है मानो इन कानूनों के बन जाने से किसान बर्बाद हो जाएंगे, पूरे देश पर बड़े कॉरपोरेट घरानों का कब्जा हो जाएगा, किसान गुलाम बन जाएंगे। यह विरोध केवल आशंकाओं के आधार पर है, किसी को यह नहीं पता कि इन कानूनों के लागू होने से वास्तव में होगा क्या? हंगामा करना मानो एकमात्र उद्देश्य है।

 

पहली बात तो यह कि कृषि पर कानून बनाने से पहले जून में इन्हीं विषयों पर सरकार अध्यादेश लेकर आई थी, उस समय कई राज्यों से चर्चा भी की गई थी। चर्चा के दौरान केवल पंजाब को छोड़कर किसी ने विरोध नहीं किया था। दूसरी बात, जब अध्यादेश जारी हुआ तो सरकार की मंशा तभी स्पष्ट हो गई थी और अध्यादेश एक कानून ही है तब राजनैतिक या किसान संगठनों ने विरोध क्यों नहीं किया? इसका मतलब है कि साजिश के तहत कानून बनाने की प्रक्रिया तक ंसद के भीतर और बाहर सरकार को किसान विरोधी साबित करने की योजना बनाई गई। वैसे हालात पैदा करने की कोशिश है जो नागरिकता संशोधन कानून के बाद देश भर में किया गया। दोनों आंदोलन का चरित्र और नारे भी एक जैसे ही हैं।

 

केंद्र सरकार पर यह दोष मढ़ा जा रहा है कि जब किसानों के हित में कोई कानून बना रहे हैं तो किसानों से या किसानों के संगठन से सलाह मशवरा या चर्चा क्यों नहीं की। हो सकता है कि कोरोना महामारी के कारण बने हालात के चलते यह संभव न हो सका हो लेकिन राजनैतिक पार्टियों के आरोप का कोई आधार नहीं है। यह आरोप कि संसद में बहुमत नहीं होने के बावजूद बिल पारित करवा लिया तो विपक्ष को भलीभांति पता है कि उनकी संख्या बल और क्षमता कितनी है। पहले भी सरकार ने राज्यसभा में वे सारे बिल पास करवा लिए जो वो चाहती थी इसलिए संसद के भीतर इस बिल को गैर वाजिब तरीके से पारित करवाने का तो कोई मामला ही नहीं है।  

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दरअसल मौजूदा राजनीति की समस्या तो उनकी हताशा है और यह समझ पाने में उनकी असमर्थता है कि मोदी सरकार और भाजपा का मुकाबला कैसे करें। अब अगर मान लें कि सरकार किसानों के संगठन या राजनैतिक दलों से चर्चा कर भी लेती तो क्या व सरकार का समर्थन करते? सभी को पता है कि नहीं करते, मतलब आज की स्थिति तो तब भी बनती। अब समझते हैं कि किसानों को तीनों बिलों से समस्या क्या है?

 राजनीतिक पार्टियां किसानों को जो भय दिखा रहे हैं वे हैं, 

  1. किसानों को उपज का समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा, 
  2. मंडी समाप्त हो जाएंगी, किसान कहां जाएंगे
  3. बड़े कॉरपोरेट का कृषि पर कब्जा हो जाएगा
  4. कॉरपोरेट काम कीमत पर उपज खरीदेंगे
  5. कॉन्ट्रैक्ट खेती से किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट को फायदा
  6. भंडारण की सीमा खोलने से जमाखोरी बढ़ेगी, महंगाई बढ़ेगी, 

इन समस्याओं के अलावा भी किसानों की कृषि कानूनों को लेकर आपत्तियां हो सकती है, लेकिन ये आपत्तियां वे हैं जो आमतौर पर सामने आ रही हैं।

 

उपरोक्त आपत्तियों के संबंध में कुछ के जवाब तो सरकार ने दे दिए हैं, याने समर्थन मुल्य पर खरीद बंद नहीं होगी, मंडी बंद नहीं होंगे। विपक्ष सरकार की बातों पर यकीन नहीं करना चाहता, अब इस अविश्वास का क्या इलाज है? कॉन्ट्रैक्ट खेती पर विवाद है, जबकि यह व्यवस्था तो भारत में बीस वर्षों से लागू है। इसी तरह अपने उपज को खुले बाज़ार में बेचने की छूट की राज्यों में है, फिर इस बिल के प्रावधानों का विरोध क्यों? यू पी ए सरकार के समय जो भाषा कांग्रेस की थी वहीं आज भाजपा की है और जो भाषा भाजपा की थी वहीं भाषा कांग्रेस बोल रही है। इसका मतलब है कि कृषि बिल को लेकर राजनीति हावी है और किसानों की दशा सुधारने में रुचि नहीं है।

 

क्या यह मान लें कि राजनीति के तुच्छ स्वार्थों के चलते किसानों की दशा सुधारने के प्रयास बंद हो जाएं? समझने की आवश्यकता यह है कि लोकसभा और राज्यसभा के आधे से अधिक सांसदों का व्यवसाय कृषि होगी, यही हाल देश के सभी राज्यों के विधानसभा में निर्वाचित विधायकों का है। इनमें से ज्यादातर किसान बड़े हैं जिनके पास बीस, तीस, पचास एकड़ और उससे भी ज्यादा क्षेत्र की खेत होगी। लेकिन इस देश में सत्तर फीसदी से ज्यादा किसान सीमांत और लघु वर्ग के हैं जिनके पास औसत कृषि भूमि एक से तीन एकड़ से ज्यादा नहीं है। अभी तक कृषि और किसानों के विकास को लेकर जितनी योजनाओ बनीं उनका लाभ इन सत्तर फीसदी से अधिक लोगों को नहीं मिला, सारा लाभ बड़े किसान ले गए। चाहे समर्थन मूल्य हो, उपज पर बोनस हो, व्यापारिक फसल लेने की योजना हो, हॉर्टिकल्चर की योजनाओं हो या कृषि ऋण माफी का लाभ हो। तो क्या देश के सत्तर फीसदी किसानों की स्थिति बदहाल बनी रहे, यही देश में गरीबी का प्रतिनिधित्व करते रहें? यह बड़ा सवाल है।

 

इन तीन विधेयकों को सरल भाषा में समझें तो किसानों को बेचने के लिए खरीदारों के विकल्प मिलेंगे, जो व्यापारी किसानों की उपज खरीदेंगे उनको भंडारण की सीमा में छूट दी गई है। एक विधेयक किसानों से बाजार और उद्योग की मांग के अनुसार किसानों से उपज पैदा करवाने का समझौता करेंगे जिसे कांट्रेक्ट खेती कहा जाता है। बड़े किसान जब भारी मात्रा में उपज लेते हैं तो उनके पास परिवहन, भंडारण और बाजार तक संपर्क की सुविधा होती है, एक-दो एकड़ वाला किसान क्या करे? संभव है इन विधेयकों से छोटे किसानों को ताकत मिले। न्यूनतम समर्थन मुल्य के भरोसे किसान केवल अन्न उत्पादन तक सीमित है जबकि फल-सब्जी, दलहन-तिलहन ज़्यादा लाभ देने वाली फसलें हैं। इन फसलों के बाजार तक छोटे किसान की पहुंच न होने से बिचौलियों के हाथों शोषित होते हैं।

 

 एक बार देश को एकजूट होकर किसानों के लिए बनाए गए कानून को सही ढंग से लागू कराने में लग जाना चाहिए। जब सरकार मान रही है कि इन कानूनों से किसानों को फायदा पहुंचेगा तो राजनीति और समाज को एक बार भरोसा करके देखना चाहिए। इसलिए नहीं कि किसान वोटबैंक हैं बल्कि इसलिए कि किसान बदहाल और परेशान हैं। उन्हें उनकी समस्या से मुक्ति दिलाने में सभी को साथ देना चाहिए। जो इन कानूनों का दुरूपयोग किसानों का शेषण करने में करे तो इसका पुरजोर प्रतिकार हो। सरकार पर भी इसके युक्तियुक्त क्रियान्वयन के लिए दबाव बने। मिलकर एक बार किसानों की स्थिति बदलने एक प्रयास तो करें, राजनीति तो सत्तर साल से हो रही है और आगे भी होती रहेगी। एक बार किसानों के लिए एकजूट हो जाएं मानों देश की समृद्धि के लिए कोई युद्ध लड़ा जा रहा है। तभी तो नारा सार्थक होगा,” जय जवान, जय किसान।“