आज की अभिव्यक्ति

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जिसकी लाठी उसकी भैंस - जंगल का विधान है | मानव की सभ्यता का विकास इस विधान को मानकर नही, बल्कि यह विधान न चल पाए इस व्यवस्था के कारण ही सभ्यता का विकास हुआ है | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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हे भारत माता देश के हर नागरिक को राम की मर्यादा, कृष्ण की उन्मुक्तता और शिव के असीमित मष्तिस्क से गढ़ों |   डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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भारतीय राजनीति में अच्छाई और सच्चाई तभी देखने को मिल सकती है जब लोग चेहरे और पार्टी से से नही बल्कि कार्यो से लोगो की पहचान, तारीफ और आलोचना करे | डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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जाति प्रथा को तोड़ने का एक ही उपाय है वह है ऊची और नीची जातियों के बीच बराबर के हिस्से का रोटी और बेटी का सम्बन्ध | - डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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अंग्रेजी का इतना दबदबा कहीं नहीं है. इसीलिए भारत आजाद होते हुए भी गुलाम है. - डॉ. राम मनोहर लोहिया..

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मर्यादा केवल न करने की नहीं होती है, करने की भी होती है. बुरे की लकीर मत लांघो, लेकिन अच्छे की लकीर तक चहल पहल होनी चाहिए. डॉ. राममनोहर लोहिया ..

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अंग्रेजी का प्रयोग मौलिक सोच में अवरोध है, हीनता की भावनाओं का प्रजनक है और शिक्षित एवं अशिक्षित जनता के बीच की दूरी है. आइये, हम हिंदी की असल प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के लिए संगठित हो जाएं. - डॉ. राममनोहर लोहिया ..

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मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्छा है, मेरे बताए हुए रास्ते पर चलें ।    - डॉ. भीमराव आंबेडकर ..

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जब तक आप सामाजिक स्ववतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी हैं । - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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"भला हम भगवान को खोजने कहां जा सकते हैं अगर उसे अपने दिल और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते." - स्वामी विवेकानंद..

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जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है.  स्वामी विवेकानंद ..

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एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है. - महात्मा गाँधी..

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राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये । - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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जो कौम अपना इतिहास तक नही जानती है, वे कौम कभी अपना इतिहास भी नही बना सकती है | - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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  डॉक्टर और गुरु के सामने झूठ मत बोलिए क्योकि यह झूठ बहुत महंगा पड़ सकता हैं | गुरु के सामने झूठ बोलने से पाप का प्रायश्चित नहीं होंगा, डॉक्टर के सामने झूठ बोलने से रोग का निदान नहीं होंगा | डॉक्टर और गुरु के सामने एकदम सरल और तरल बनकर पेश हो | आप कि..

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गुलाब कांटों में भी हंसता है गुलाब कांटों में भी हंसता है इसलिए लोग उसे प्रेम करते हैं, तुम भी ऐसे काम करो कि तुमसे नफरत करने वाले लोग भी तुमसे प्रेम करने पर विवश हो जायें।              &n..

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अगर तुम्हारी वजह से कोई इ्ंसान दुखी रहे तो समझ लो ये तुम्हारे लिए सबसे बड़ा पाप है, ऐसे काम करो कि लोग तुम्हारे जाने के बाद दु:खी होकर आसूं बहाए तभी तुम्हें पुण्य मिलेगा ।                        ..

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सत्य की कोई भाषा नहीं है. भाषा तो सिर्फ मनुष्य द्वारा बनाई गई है, लेकिन सत्य मनुष्य का निर्माण नहीं, आविष्कार है. सत्य को बनाना या प्रमाणित नहीं करना पड़ता. आदि शंकराचार्य ..

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कुरुते गंगासागर गमनं व्रत परिपालनम् अथवा दानम् । ज्ञान विहीनम् सर्वम् तेन मुक्ति न भवति जन्म शतेन ।। अर्थात,  चाहे तीर्थ जायें,उपवास करें या दान करें , ज्ञान नहीं है तो यह फलदायी नहीं होगा,              और सौ जन्मों में भी उद्धार नहीं होगा  । आदि शंकराचार्य ..

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शरीर और मन से शुद्ध - पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है । मनुस्मृति ..

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जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का आदर – सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका आदर – सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं भले ही वे कितना ही श्रेष्ट कर्म कर लें, उन्हें अत्यंत दुखों का सामना करना पड़ता है| - मनु स्मृति (श्लोक 3/56)..

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उस स्थान पर एक पल भी नही ठहरना चाहिए जहाँ आपकी इज्जत न हो, जहाँ आप अपनी जीविका नही चला सकते है जहाँ आपका कोई दोस्त नही हो और ऐसे जगह जहाँ ज्ञान की तनिक भी बाते न हो | आचार्य चाणक्य  ..

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कोई देश तब बिखर कर टूटने लगता है जब उसके घर की फूट पतंगों की भांति टिमटिमा कर बुझने लगती है और शासन जन की उपेक्षा करने लगता है, उस सीमा तक जिस सीमा तक की बाहर के शासक से भी आशा नहीं की जा सकती | आचार्य चाणक्य  ..

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किसी भी इंसान को मारना आसान है, परन्तु उसके विचारों को नहीं। महान साम्राज्य टूट जाते हैं, तबाह हो जाते हैं, जबकि उनके विचार बच जाते हैं।  - शहीद भगत सिंह ..

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जो लोंग मन को नियंत्रित नहीं करते। उनके लिए मन शत्रु के समान कार्य करता है। – श्रीमद्भगवद्गीता..

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भारत में हमारे विकास पथ में दो बड़ी बाधाएं है,  सनातन परम्पराओं की कमजोरियाँ और यूरोपीय सभ्यता की बुराइयाँ। मैं दोनों में से सनातन परम्पराओं की कमजोरियाँ अपनाना पसंद करूँगा ।  - स्वामी विवेकानंद ..

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आसेतु हिमाचल तक फैला हुआ हिन्दू समाज हमें संघठित करना है, संघ केवल स्वयंसेवको तक ही सीमित नहीं है, संघ बाहर के लोगो के लिए भी है. राष्ट्रोद्धार का सही मार्ग लोगों को दिखाना ही हमारा कर्तव्य है.  - प.पू. हेडगेवार..

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ऐसे व्यक्तित्व भी है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राण दे दिए. सत्य है वे आदरणीय, महान और प्रेरणा के स्रोत है. परन्तु जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण देश और धर्म के लिए दे दिया, जिन्होंने अपने आप को पूरा जीवन जलाते हुए अगणित लोगो के हृदय को जग..

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यदि आप सफल होना चाहते हैं तो अपना ध्यान समस्या खोजने में नहीं समाधान खोजने में लगाइए | --- स्वामी रामतीर्थ ---  ..

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भोपाल(विसंके). "भारतभूमि .... आसेतु हिमालय पर्यन्त एक 'सिद्ध कन्या' ही नहीं साक्षात माता है|" मूलाधार चक्र कन्याकुमारी' है, जहाँ का त्रिकोण शक्ति का स्त्रोत है| इसी मूलाधार से इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ प्रस्फुटित होती हैं| कैलाश पर्वत सहस्त्रार है..

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वेदान्त कोई पाप नहीं जानता, वो केवल त्रुटी जानता है. और वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ी त्रुटी यह कहना है कि तुम कमजोर हो, तुम पापी हो, एक तुच्छ प्राणी हो, और तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं है और तुम कुछ नहीं कर सकते. स्वामी विवेकानंद ..

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जो धर्म, सत्य, क्षेष्ठता और परमेश्वर के सामने झुकता है । उसका आदर समस्त संसार करता है । छत्रपति शिवाजी महाराज ..

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आत्मबल सामर्थ्य की तरफ ले जाता है, सामर्थ्य, विद्या प्रदान करता है |विद्या स्थिरता प्रदान करती है  और स्थिरता, विजय की तरफ ले जाती है | - छत्रपति शिवाजी महाराज ..

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सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर । अतः पहले खुद को नही राष्ट्र को देखना चाहिए । - छत्रपति शिवाजी महाराज ..

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हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है, तो उसे कष्ट ही मिलता है. यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ कभी नहीं छोड़ती |  -गौतम बुद्ध  ..

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अगर आप वाकई में अपने आप से प्रेम करते है, तो आप किसी दूसरे  को दु:खी नहीं कर सकते हैं | गौतम बुद्ध  ..

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एक समय में एक ही काम करो और पूरी निष्ठां और लगन से करो बाकि सब कुछ भुला दो | - स्वामी विवेकानंद ..

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कभी ना मत कहो, कभी यह न कहो कि  ‘मैं नहीं कर सकता’, क्योंकि आप अनंत हैं.  सभी शक्ति आप के भीतर है. आप कुछ भी कर सकते हैं | - स्वामी विवेकानंद  ..

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आप जो भी सोचेंगे. आप वही हो जाएंगे. अगर आप खुद को कमजोर सोचेंगे तो आप कमजोर बन जाएंगे. अगर आप सोचेंगे की आप शक्तिशाली हैं तो आप शाक्तिशाली बन जाएंगे.    -स्वामी विवेकानंद..

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ख्याति-प्रेम वह प्यास है जो कभी नहीं बुझती । वह अगस्त ऋषि की भांति सागर को पीकर भी शांत नहीं होती ।  - मुंशी प्रेमचंद ..

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समानता की बात तो बहुत से लोग करते हैं, लेकिन जब उसका अवसर आता है तो खामोश रह जाते हैं ।  - मुंशी प्रेमचंद ..

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भोपाल(विसंके). आशा उत्साह की जननी है । आशा में तेज है, बल है, जीवन है । आशा ही संसार की संचालक शक्ति है । - मुंशी प्रेमचंद ..

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  खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है, आगे बढ़ते रहने की लगन का । मुंशी प्रेमचंद ..

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केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है।   - प्रेमचंद..

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किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिये, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है.  - रवीन्द्रनाथ टैगोर ..

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जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है ; यदि हम उसे ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं.   -   रवीन्द्रनाथ टैगोर ..

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हर एक कठिनाई जिससे आप मुंह मोड़ लेते हैं,एक भूत बन कर आपकी नीद में बाधा डालेगी. रवीन्द्रनाथ टैगोर ..

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आस्था वह पक्षी है जो भोर के अँधेरे में भी उजाले को महसूस करती है - रवीन्द्रनाथ ..

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आपका लक्ष्य किसी जादू से नहीं पूरा होगा, बल्कि आपको ही अपना लक्ष्य प्राप्त करना पड़ेगा. कमजोर ना बनें, शक्तिशाली बनें और यह विश्वास रखें की भगवान हमेशा आपके साथ है । -लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ..

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धर्म और व्यावहारिक जीवन अलग नहीं हैं । संन्यास लेना जीवन का परित्याग करना नहीं है। असली भावना सिर्फ अपने लिए काम करने की बजाए देश को अपना परिवार बनाकर मिल-जुलकर काम करना है। इसके बाद का कदम मानवता की सेवा करना है और अगला कदम ईश्वर की सेवा करना है । - बालगंगाधर लोकमान्य तिलक..

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अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: विरोधी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है. लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाए? तब हमें आत्म – बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर निर्भर न करें. - शहीद भगत सिंह ..

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मैं यह बात जोर देकर कहता हूँ कि मैं महत्त्वाकांक्षा और  आशा एवं जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ. परन्तु आवश्यक होने पर मैं यह सब त्याग सकता हूँ, और वही सच्चा त्याग है. - शहीद भगतसिंह ..

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विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है.  - पंडित दीनदयाल उपाध्याय..

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अपने इस दोहे में संत कबीरदासजी कहते हैं की एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा न करो जैसे वो पैरों के नीचे आकर बुझ जाता हैं वैसे ही वो उड़कर आँख में चला जाये तो बहोत बड़ा घाव देता हैं। संत कबीरदास ..

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भोपाल(विसंके). यह देश यदि पश्चिम की शक्तियों को ग्रहण करे और अपनी शक्तिओं का भी विनाश नहीं होने दे तो उसके भीतर से जिस संस्कृति का उदय होगा वह अखिल विश्व के लिए कल्याणकारिणी होगी. वास्तव में वही संस्कृति विश्व की अगली संस्कृति बनेगी. महर्षि अरविन्द ..

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गुण कोई किसी को नहीं सिखा सकता. दूसरे के गुण लेने या सीखने की जब भूख मन में जागती है, तो गुण अपने आप सीख लिए जाते हैं. महर्षि अरविन्द ..

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युगों का भारत मृत नहीं हुआ है और न उसने अपना अंतिम सृजनात्मक शब्द उच्चारित ही किया है, वह जीवित है और उसे अभी भी स्वयं अपने लिए और मानव लोगों के लिए बहुत कुछ करना है और जिसे अब जागृत होना आवश्यक है - महर्षि अरविन्द..

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“जब दरिद्र तुम्हारे साथ हों, तो उनकी सहायता करो | लेकिन अध्ययन करो | और यह प्रयास भी करो कि तुम्हारी सहायता पाने के लिए दरिद्र लोग न बचे रहे |” महर्षि अरविन्द ..

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“आगामी वर्षों के लिए हमारा एक ही देवता होगा और वह है अपनी ‘मातृभूमि’ | भारत दूसरे देवताओं को अपने मन में लुप्त हो जाने दो हमारा मातृ रूप केवल यही देवता है जो जाग रहा है | इसके हर जगह हाथ है, हर जगह पैर है, हर जगह काम है, हर विराट की पूजा ही हमारी मुख्य पूजा है | सबसे पहले जिस देवता की पूजा करेंगे वह है हमारा देशवासी | ” - स्वामी विवेकानन्द..

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“लुढ़कते पत्थर में काई नहीं लगती” वास्तव में वे धन्य हैं. जो शुरू से ही जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं | जीवन की संध्या होते-होते उन्हें बड़ा संतोष मिलता है कि उन्होंने निरुद्धेश्य जीवन नहीं जिया तथा लक्ष्य खोजने में अपना समय नहीं गवाया | जीवन उस तीर की तरह होना चाहिए जो लक्ष्य पर सीधा लगता है और निशाना व्यर्थ नहीं जाता | - स्वामी विवेकानंद ..

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अखंड श्रद्धा और दृढ़ संकल्प यही जिनकी एकमात्र शक्ति होती है, ऐसे सामान्य मनुष्यों से ही देश के महान कार्य हुए हैं |    - परम पूजनीय गुरू..

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महानता के लिए छोटी - छोटी बातों को आयोजित करना पड़ता है. महान व्यक्तित्व एक ही दिन में तैयार नहीं होते, वे तो चुपचाप धीरे - धीरे क्रमवार रीति से बढ़ते हैं | त्याग प्रेम और आदर्श उनके व्यक्तित्व को महान बनाते हैं |    - परम पूजनीय गुरूजी..

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तीर्थ करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। सबसे अच्छा और बड़ा तीर्थ आपका अपना मन है, जिसे विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो। - आदि शंकराचार्य                                   ..

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जिस तरह एक प्रज्वलित दीपक के चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है। उसी तरह आत्मा जो खुद ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है, अपने खुद के ज्ञान के लिए। - आदि शंकराचार्य..

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मोह से भरा हुआ इंसान एक सपने कि तरह हैं, यह तब तक ही सच लगता है जब तक आप अज्ञान की नींद में सो रहे होते है। जब नींद खुलती है तो इसकी कोई सत्ता नही रह जाती है। - आदि शंकराचार्य..

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सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर। अतः पहले खुद को नही राष्ट्र को देखना चाहिए। - छत्रपति शिवाजी ..

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय। अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे - संत कबीरदास..

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कबीर दास जी कहते हैं कि किसी भी सज्जन या साधु की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को हमें समझना चाहिए. हमेशा तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का. -संत कबीरदास ..

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जो मनुष्य समय के कुच्रक में भी पूरी शिद्दत से, अपने कार्यों में लगा रहता है। उसके लिए समय खुद बदल जाता है।    - क्षत्रपति शिवाजी महाराज  ..

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यदि एक पेड़, जोकि इतनी उच्च जीवित सत्ता नहीं है, इतना सहिष्णु और दयालु हो सकता है कि किसी के द्वारा मारे जाने पर भी  उसे मीठे आम दे, तो एक राजा होकर, क्या मुझे एक पेड़ से अधिक सहिष्णु और दयालु नहीं होना चाहिए?        - क्षत्रपति ..

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भोपाल(विसंके). भारत का यश उसकी राजनीतिक संस्थाओं और सैनिक शक्ति से नहीं बल्कि उसकी आध्यात्मिक महानता, सत्य और आत्मा के विचारों दु:खी मानवों की सेवा में, अभिव्यक्त सर्वोच्च शक्ति की विराटता में उसके विश्वास पर आधारित है.  -डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी..

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भोपाल(विसंके). एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान: नहीं चलेंगे – डॉ . श्यामाप्रसाद मुखर्जी..

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“अपने हिन्दू समाज को बलशाली और संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन्म लिया ” - परम पूजनीय केशव बलिराम हेडगेवार जी ..

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भोपाल(विसंके). ध्येय पर अविचल दृष्टि रख कर मार्ग में मखमली बिछौने हों या कांटे बिखरे हों, उनकी चिंता न करते हुए निरंतर आगे ही बढने के दृढ़ निश्चय वाले कृतिशील तरुण खड़े करने पड़ेंगे.      - परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार  ..

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भोपाल(विसंके). हिन्दुस्थान के साथ जिसके सारे हित संबंध जुड़े हैं, जो इस देश को भारतमाता कह कर अति पवित्र दृष्टि से देखता है तथा जिसका देश के बाहर कोई अन्य आधार नहीं है, ऐसा महान धर्म और संस्कृति से एकसूत्र में गुंथा हुआ हिन्दू समाज ही यहाँ का राष्ट्रीय समा..

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भोपाल(विसंके). जिस तरह एक प्रज्वलित दीपक के चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है।उसी तरह आत्मा जो खुद ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है, अपने खुद के ज्ञान के लिए। - आदि शंकराचार्य ..

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भोपाल(विसंके). आत्मसंयम क्या है ? आंखो को दुनिया की चीज़ों कि ओर आकर्षित न होने देना और बाहरी ताकतों को खुद से दूर रखना। - आदि शंकराचार्य   ..

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जब मन में सच जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाए, तो दुनिया की चीज़े अर्थहीन लगती हैं.. -   आदि शंकराचार्य ..

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जीवन में सफलता पाने के लिए, आत्म विश्वास उतना ही ज़रूरी है , जितना जीने के लिए भोजन. कोई भी सफलता बिना आत्मा विश्वास के मिलना असंभव है. - पं. श्रीराम शर्मा ..

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भोपाल(विसंके). हम बाहरी दुनिया में कभी शांति नहीं पा सकते हैं,जब तक की हम अन्दर से शांत न हों |       - दलाई लामा ..

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भोपाल(विसंके). हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ है और न अंत ही, यह एक अनंत चक्र है.     - भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी..

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भोपाल(विसंके). ईश्वर पूर्ण रूप से पवित्र और बुद्धिमान है. उसकी प्रकृति, गुण, और शक्तियां सभी पवित्र हैं. वह सर्वव्यापी, निराकार, अजन्मा, अपार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, दयालु और न्याययुक्त है. वह दुनिया का रचनाकार, रक्षक, और संघारक है.       -  स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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भोपाल(विसंके). मन सृष्टि के विधाता द्वारा मानव-जाति को प्रदान किया गया एक ऐसा उपहार है, जो मनुष्य के परिवर्तनशील जीवन की स्थितियों के अनुसार स्वयं अपना रूप और आकार भी बदल लेता है.    - वीर सावरकर ..

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भोपाल(विसंके). "प्रेम विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है. इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है. वह जो प्रेम करता है जीता है, वह जो स्वार्थी है मर रहा है. इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो, क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है, वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो". - स्वामी विवेकानंद..

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भोपाल(विसंके). हिन्दू धर्म कोई ताड़ –पत्र पर लिखित पोथी नहीं जो ताड़ – पत्र के चटकते ही चूर – चूर हो जायेगा, आज उत्पन्न होकर कल नष्ट हो जायेगा. यह कोई गोलमेज परिषद का प्रस्ताव भी नहीं, यह तो एक महान जाति का जीवन है; यह एक शब्द- भर नहीं, अपितु सम्पूर्ण इतिहास है – अधिक नहीं तो चालीस सहस्त्राब्दियों का इतिहास इसमें भरा हुआ है.     - वीर सावरकर ..

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मानव ईश्वरप्रदत्त बुद्धि का उपयोग नहीं करता, आँखें होते हुए भी नहीं देखता, इसीलिए वह दुखी रहता है .      - सरदार वल्लभ पटेल ..

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हमारा कर्तव्य है कि हम हर किसी को उसका उच्चतम आदर्श जीवन जीने के संघर्ष में प्रोत्साहन करें, और साथ ही साथ उस आदर्श को सत्य के जितना निकट हो सके लाने का प्रयास करें.     - स्वामी विवेकानंद ..

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सारी उन्नति की कुंजी ही स्त्री की उन्नति में है. स्त्री यह समझ ले तो स्वयं को अबला न कहे. वह तो शक्ति-रूप है. माता के बिना कौन पुरूष पृथ्वी पर पैदा हुआ है.       -  सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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कल किये जाने वाले कर्म का विचार करते-करते आज का कर्म भी बिगड़ जाएगा. और आज के कर्म के बिना कल का कर्म भी नहीं होगा, अतः आज का कर्म कर लिया जाये तो कल का कर्म स्वत: हो जाएगा.   - सरदार वल्लभ भाई पटेल..

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भोपाल(विसंके). जो व्यक्ति अपना दोष जनता है उसे स्वीकार करता है, वही ऊँचा उठता है. हमारा प्रयत्न होना चाहिए कि हम अपने दोषों को त्याग दें.                  - सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूँ। देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है, यह मानकर मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।             - वीर सावरकर  ..

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भोपाल(विसंके). कठिनाई दूर करने का प्रयत्न ही न हो तो कठिनाई कैसे मिटे. इसे देखते ही हाथ-पैर बाँधकर बैठ जाना और उसे दूर करने का कोई भी प्रयास न करना निरी कायरता है.             - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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पड़ोसी का महल देखकर अपनी झोपडी तोड़ डालने वाला महल तो बना नहीं सकता, अपनी झोपडी भी खो बैठता है.     -  लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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मानव की प्रगति का अर्थ, शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा इन चारों की प्रगति है              - पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति सदैव आशावान रहता है |    - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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यह जरुरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचते हैं, जिसके बिना आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है.                     - पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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धर्म का सिद्धांत है, केवल कर्म करो; उसके परिणामों पर ध्यान मत दो. एकमात्र कर्म ही हमारा पथ-प्रदर्शक होना चाहिए. ईश्वर नहीं कहता कि कार्य करो या उसका त्याग करो; यह तो सब प्रकृति की क्रीड़ा है.      -लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ..

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आपस के सारे कृत्रिम ऊपरी भेद मिटा कर सम्पूर्ण समाज एकत्व और प्रेम की भावना से तथा हिन्दू जाति को गंगा के हम सब हिन्दू की ओर टेढ़ी नजर से नहीं देख सकेगी.       -परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार  ..

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ज्ञान प्राप्त होने पर किया गया कर्म सफलतादायक होता है, क्योंकि ज्ञान – युक्त कर्म ही समाज के लिए हितकारक है. ज्ञान – प्राप्ति जितनी कठिन है, उससे अधिक कठिन है – उसे संभाल कर रखना . मनुष्य तब तक कोई भी ठोस पग नहीं उठा सकता यदि उसमें राज..

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समय से पूर्व कोई मृत्यु को प्राप्त नहीं करता और जब समय आ जाता है तो कोई अर्थात कोई भी इससे बच नहीं सकता. हजारों – लाखों बीमारी से ही मर जाते हैं, पर जो धर्मयुद्ध में मृत्यु प्राप्त करते हैं, उनके लिए तो अपूर्व सौभाग्य की बात है. ऐसे लोग तो हुतात्म..