आज की अभिव्यक्ति

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अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: विरोधी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है. लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाए? तब हमें आत्म – बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर निर्भर न करें. - शहीद भगत सिंह ..

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मैं यह बात जोर देकर कहता हूँ कि मैं महत्त्वाकांक्षा और  आशा एवं जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ. परन्तु आवश्यक होने पर मैं यह सब त्याग सकता हूँ, और वही सच्चा त्याग है. - शहीद भगतसिंह ..

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विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है.  - पंडित दीनदयाल उपाध्याय..

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अपने इस दोहे में संत कबीरदासजी कहते हैं की एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा न करो जैसे वो पैरों के नीचे आकर बुझ जाता हैं वैसे ही वो उड़कर आँख में चला जाये तो बहोत बड़ा घाव देता हैं। संत कबीरदास ..

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भोपाल(विसंके). यह देश यदि पश्चिम की शक्तियों को ग्रहण करे और अपनी शक्तिओं का भी विनाश नहीं होने दे तो उसके भीतर से जिस संस्कृति का उदय होगा वह अखिल विश्व के लिए कल्याणकारिणी होगी. वास्तव में वही संस्कृति विश्व की अगली संस्कृति बनेगी. महर्षि अरविन्द ..

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गुण कोई किसी को नहीं सिखा सकता. दूसरे के गुण लेने या सीखने की जब भूख मन में जागती है, तो गुण अपने आप सीख लिए जाते हैं. महर्षि अरविन्द ..

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युगों का भारत मृत नहीं हुआ है और न उसने अपना अंतिम सृजनात्मक शब्द उच्चारित ही किया है, वह जीवित है और उसे अभी भी स्वयं अपने लिए और मानव लोगों के लिए बहुत कुछ करना है और जिसे अब जागृत होना आवश्यक है - महर्षि अरविन्द..

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“जब दरिद्र तुम्हारे साथ हों, तो उनकी सहायता करो | लेकिन अध्ययन करो | और यह प्रयास भी करो कि तुम्हारी सहायता पाने के लिए दरिद्र लोग न बचे रहे |” महर्षि अरविन्द ..

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“आगामी वर्षों के लिए हमारा एक ही देवता होगा और वह है अपनी ‘मातृभूमि’ | भारत दूसरे देवताओं को अपने मन में लुप्त हो जाने दो हमारा मातृ रूप केवल यही देवता है जो जाग रहा है | इसके हर जगह हाथ है, हर जगह पैर है, हर जगह काम है, हर विराट की पूजा ही हमारी मुख्य पूजा है | सबसे पहले जिस देवता की पूजा करेंगे वह है हमारा देशवासी | ” - स्वामी विवेकानन्द..

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“लुढ़कते पत्थर में काई नहीं लगती” वास्तव में वे धन्य हैं. जो शुरू से ही जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं | जीवन की संध्या होते-होते उन्हें बड़ा संतोष मिलता है कि उन्होंने निरुद्धेश्य जीवन नहीं जिया तथा लक्ष्य खोजने में अपना समय नहीं गवाया | जीवन उस तीर की तरह होना चाहिए जो लक्ष्य पर सीधा लगता है और निशाना व्यर्थ नहीं जाता | - स्वामी विवेकानंद ..

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अखंड श्रद्धा और दृढ़ संकल्प यही जिनकी एकमात्र शक्ति होती है, ऐसे सामान्य मनुष्यों से ही देश के महान कार्य हुए हैं |    - परम पूजनीय गुरू..

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महानता के लिए छोटी - छोटी बातों को आयोजित करना पड़ता है. महान व्यक्तित्व एक ही दिन में तैयार नहीं होते, वे तो चुपचाप धीरे - धीरे क्रमवार रीति से बढ़ते हैं | त्याग प्रेम और आदर्श उनके व्यक्तित्व को महान बनाते हैं |    - परम पूजनीय गुरूजी..

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तीर्थ करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। सबसे अच्छा और बड़ा तीर्थ आपका अपना मन है, जिसे विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो। - आदि शंकराचार्य                                   ..

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जिस तरह एक प्रज्वलित दीपक के चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है। उसी तरह आत्मा जो खुद ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है, अपने खुद के ज्ञान के लिए। - आदि शंकराचार्य..

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मोह से भरा हुआ इंसान एक सपने कि तरह हैं, यह तब तक ही सच लगता है जब तक आप अज्ञान की नींद में सो रहे होते है। जब नींद खुलती है तो इसकी कोई सत्ता नही रह जाती है। - आदि शंकराचार्य..

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सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर। अतः पहले खुद को नही राष्ट्र को देखना चाहिए। - छत्रपति शिवाजी ..

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय। अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे - संत कबीरदास..

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कबीर दास जी कहते हैं कि किसी भी सज्जन या साधु की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को हमें समझना चाहिए. हमेशा तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का. -संत कबीरदास ..

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जो मनुष्य समय के कुच्रक में भी पूरी शिद्दत से, अपने कार्यों में लगा रहता है। उसके लिए समय खुद बदल जाता है।    - क्षत्रपति शिवाजी महाराज  ..

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यदि एक पेड़, जोकि इतनी उच्च जीवित सत्ता नहीं है, इतना सहिष्णु और दयालु हो सकता है कि किसी के द्वारा मारे जाने पर भी  उसे मीठे आम दे, तो एक राजा होकर, क्या मुझे एक पेड़ से अधिक सहिष्णु और दयालु नहीं होना चाहिए?        - क्षत्रपति ..

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भोपाल(विसंके). भारत का यश उसकी राजनीतिक संस्थाओं और सैनिक शक्ति से नहीं बल्कि उसकी आध्यात्मिक महानता, सत्य और आत्मा के विचारों दु:खी मानवों की सेवा में, अभिव्यक्त सर्वोच्च शक्ति की विराटता में उसके विश्वास पर आधारित है.  -डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी..

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भोपाल(विसंके). एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान: नहीं चलेंगे – डॉ . श्यामाप्रसाद मुखर्जी..

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“अपने हिन्दू समाज को बलशाली और संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन्म लिया ” - परम पूजनीय केशव बलिराम हेडगेवार जी ..

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भोपाल(विसंके). ध्येय पर अविचल दृष्टि रख कर मार्ग में मखमली बिछौने हों या कांटे बिखरे हों, उनकी चिंता न करते हुए निरंतर आगे ही बढने के दृढ़ निश्चय वाले कृतिशील तरुण खड़े करने पड़ेंगे.      - परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार  ..

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भोपाल(विसंके). हिन्दुस्थान के साथ जिसके सारे हित संबंध जुड़े हैं, जो इस देश को भारतमाता कह कर अति पवित्र दृष्टि से देखता है तथा जिसका देश के बाहर कोई अन्य आधार नहीं है, ऐसा महान धर्म और संस्कृति से एकसूत्र में गुंथा हुआ हिन्दू समाज ही यहाँ का राष्ट्रीय समा..

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भोपाल(विसंके). जिस तरह एक प्रज्वलित दीपक के चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है।उसी तरह आत्मा जो खुद ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है, अपने खुद के ज्ञान के लिए। - आदि शंकराचार्य ..

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भोपाल(विसंके). आत्मसंयम क्या है ? आंखो को दुनिया की चीज़ों कि ओर आकर्षित न होने देना और बाहरी ताकतों को खुद से दूर रखना। - आदि शंकराचार्य   ..

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जब मन में सच जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाए, तो दुनिया की चीज़े अर्थहीन लगती हैं.. -   आदि शंकराचार्य ..

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जीवन में सफलता पाने के लिए, आत्म विश्वास उतना ही ज़रूरी है , जितना जीने के लिए भोजन. कोई भी सफलता बिना आत्मा विश्वास के मिलना असंभव है. - पं. श्रीराम शर्मा ..

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भोपाल(विसंके). हम बाहरी दुनिया में कभी शांति नहीं पा सकते हैं,जब तक की हम अन्दर से शांत न हों |       - दलाई लामा ..

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भोपाल(विसंके). हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ है और न अंत ही, यह एक अनंत चक्र है.     - भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी..

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भोपाल(विसंके). ईश्वर पूर्ण रूप से पवित्र और बुद्धिमान है. उसकी प्रकृति, गुण, और शक्तियां सभी पवित्र हैं. वह सर्वव्यापी, निराकार, अजन्मा, अपार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, दयालु और न्याययुक्त है. वह दुनिया का रचनाकार, रक्षक, और संघारक है.       -  स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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भोपाल(विसंके). मन सृष्टि के विधाता द्वारा मानव-जाति को प्रदान किया गया एक ऐसा उपहार है, जो मनुष्य के परिवर्तनशील जीवन की स्थितियों के अनुसार स्वयं अपना रूप और आकार भी बदल लेता है.    - वीर सावरकर ..

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भोपाल(विसंके). "प्रेम विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है. इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है. वह जो प्रेम करता है जीता है, वह जो स्वार्थी है मर रहा है. इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो, क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है, वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो". - स्वामी विवेकानंद..

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भोपाल(विसंके). हिन्दू धर्म कोई ताड़ –पत्र पर लिखित पोथी नहीं जो ताड़ – पत्र के चटकते ही चूर – चूर हो जायेगा, आज उत्पन्न होकर कल नष्ट हो जायेगा. यह कोई गोलमेज परिषद का प्रस्ताव भी नहीं, यह तो एक महान जाति का जीवन है; यह एक शब्द- भर नहीं, अपितु सम्पूर्ण इतिहास है – अधिक नहीं तो चालीस सहस्त्राब्दियों का इतिहास इसमें भरा हुआ है.     - वीर सावरकर ..

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मानव ईश्वरप्रदत्त बुद्धि का उपयोग नहीं करता, आँखें होते हुए भी नहीं देखता, इसीलिए वह दुखी रहता है .      - सरदार वल्लभ पटेल ..

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हमारा कर्तव्य है कि हम हर किसी को उसका उच्चतम आदर्श जीवन जीने के संघर्ष में प्रोत्साहन करें, और साथ ही साथ उस आदर्श को सत्य के जितना निकट हो सके लाने का प्रयास करें.     - स्वामी विवेकानंद ..

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सारी उन्नति की कुंजी ही स्त्री की उन्नति में है. स्त्री यह समझ ले तो स्वयं को अबला न कहे. वह तो शक्ति-रूप है. माता के बिना कौन पुरूष पृथ्वी पर पैदा हुआ है.       -  सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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कल किये जाने वाले कर्म का विचार करते-करते आज का कर्म भी बिगड़ जाएगा. और आज के कर्म के बिना कल का कर्म भी नहीं होगा, अतः आज का कर्म कर लिया जाये तो कल का कर्म स्वत: हो जाएगा.   - सरदार वल्लभ भाई पटेल..

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भोपाल(विसंके). जो व्यक्ति अपना दोष जनता है उसे स्वीकार करता है, वही ऊँचा उठता है. हमारा प्रयत्न होना चाहिए कि हम अपने दोषों को त्याग दें.                  - सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूँ। देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है, यह मानकर मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।             - वीर सावरकर  ..

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भोपाल(विसंके). कठिनाई दूर करने का प्रयत्न ही न हो तो कठिनाई कैसे मिटे. इसे देखते ही हाथ-पैर बाँधकर बैठ जाना और उसे दूर करने का कोई भी प्रयास न करना निरी कायरता है.             - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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पड़ोसी का महल देखकर अपनी झोपडी तोड़ डालने वाला महल तो बना नहीं सकता, अपनी झोपडी भी खो बैठता है.     -  लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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मानव की प्रगति का अर्थ, शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा इन चारों की प्रगति है              - पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति सदैव आशावान रहता है |    - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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यह जरुरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचते हैं, जिसके बिना आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है.                     - पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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धर्म का सिद्धांत है, केवल कर्म करो; उसके परिणामों पर ध्यान मत दो. एकमात्र कर्म ही हमारा पथ-प्रदर्शक होना चाहिए. ईश्वर नहीं कहता कि कार्य करो या उसका त्याग करो; यह तो सब प्रकृति की क्रीड़ा है.      -लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ..

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आपस के सारे कृत्रिम ऊपरी भेद मिटा कर सम्पूर्ण समाज एकत्व और प्रेम की भावना से तथा हिन्दू जाति को गंगा के हम सब हिन्दू की ओर टेढ़ी नजर से नहीं देख सकेगी.       -परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार  ..

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ज्ञान प्राप्त होने पर किया गया कर्म सफलतादायक होता है, क्योंकि ज्ञान – युक्त कर्म ही समाज के लिए हितकारक है. ज्ञान – प्राप्ति जितनी कठिन है, उससे अधिक कठिन है – उसे संभाल कर रखना . मनुष्य तब तक कोई भी ठोस पग नहीं उठा सकता यदि उसमें राज..

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समय से पूर्व कोई मृत्यु को प्राप्त नहीं करता और जब समय आ जाता है तो कोई अर्थात कोई भी इससे बच नहीं सकता. हजारों – लाखों बीमारी से ही मर जाते हैं, पर जो धर्मयुद्ध में मृत्यु प्राप्त करते हैं, उनके लिए तो अपूर्व सौभाग्य की बात है. ऐसे लोग तो हुतात्म..

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जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब हमने उनके विरोध में गर्व का अनुभव किया, लेकिन हैरत की बात है कि  अब  जबकि अंग्रेज चले गए हैं, पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन गया है.           पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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ब्राह्मणों से चाण्डाल तक सारे-के-सारे हिन्दू समाज की हड्डियों में प्रवेश कर  यह जाति- अहंकार उसे चूस रहा है और पूरा हिन्दू समाज इस जाति – अहंकारगत द्वेष के कारण जाति – कलह के यक्ष्मा की प्रबलता से जीर्ण – शीर्ण हो गया है.   ..

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हमारी पीढी ऐसे समय में और ऐसे देश में पैदा हुई है कि प्रत्येक उदार एवं सच्चे हृदय के लिए यह बात आवश्यक हो गई है कि वह अपने लिए उस मार्ग का चयन करे जो आहों, सिसकियों और विरह के मध्य से गुजरता है. बस,यही मार्ग कर्म का मार्ग है.        ..

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हिन्दू जाति की गृहस्थली है – भारत, जिसकी गोद में महापुरूष, अवतार, देवी-देवता और देव – जन खेले हैं. यही हमारी पितृभूमि और पुण्यभूमि है. यही हमारी कर्मभूमि है और इससे हमारी वंशगत और सांस्कृतिक आत्मीयता के सम्बन्ध जुड़े हैं.      ..

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इतिहास, समाज और राष्ट्र को पुष्ट करनेवाला हमारा दैनिक व्यवहार ही हमारा धर्म है. धर्म की यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि कोई भी मनुष्य धर्मातीत रह ही नहीं सकता. देश इतिहास, समाज के प्रति विशुद्ध प्रेम एवं न्यायपूर्ण व्यवहार ही सच्चा धर्म है.     ..

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हमारे देश और समाज के माथे पर एक कलंक है – अस्पृश्यता हिन्दू समाज के, धर्म के ,रास्त्र के करोड़ों हिन्दू बन्धु इससे अभिशप्त हैं. जब तक हम ऐसे बनाए हुए हैं, तब तक हमारे शत्रु हमें परस्पर लदवाकर, विभाजित क्र सफल होते रहेंगे. इस घातक बुराई को हमें त्या..

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जब तक देश में लाखों लोग भूखे और अनपढ़ हैं, में हर उस आदमी को देशद्रोही मानता हूँ, जो पढ़ने-लिखने और काबिल बनने के बाद उनकी मुसीबतों पर जरा भी ध्यान देने को तैयार नहीं.      - स्वामी विवेकानंद..

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जिसने भगवान को पहचान लिया, उसके लिए तो संसार में कोई अस्पृश्य नहीं है, उसके मन में ऊँच-नीच का भेद कहाँ ! अस्पृश्य तो वह प्राणी है जिसके प्राण निकल गए हों अर्थात वह शव बन गया हो. अस्पृश्यता एक वहम है. जब कुत्ते को छूकर, बिल्ली को छूकर नहाना नहीं पड़ता तो ..

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कल किये जानेवाले कर्म का विचार करते-करते आज का कर्म भी बिगड़ जाएगा. और आज के कर्म के बिना कल का कर्म भी नहीं होगा, अतः आज का कर्म कर लिया जाये तो कल का कर्म स्वत: हो जाएगा.   - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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सत्ताधीशों की सत्ता उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाती है, पर महान देशभक्तों की सत्ता मरने के बाद काम करती है, अतः देशभक्ति अर्थात् देश-सेवा में जो मिठास है, वह और किसी चीज में नहीं.    - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल  ..

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सम्पूर्ण व शक्तिशाली हिन्दू समाज यही हम सबका एकमात्र श्रद्धास्थान होना चाहिए. जाति, भाषा, प्रान्त, पक्ष ऐसी सभी विचारो को समाज भक्ति के बीच में नहीं आने देना चाहिए.      - परम पूजनीय गुरूजी ..

“पुष्प की अभिलाषा के रचियता” श्री माखनलाल चतुर्वेदी / जन्म दिवस – 4 अप्रैल

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक ।मातृभूमि हित शीश चढ़ाने, जिस पथ जायें वीर अनेेक।।श्री माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को ग्राम बाबई, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में श्री नन्दलाल एवं श्रीमती सुन्दराबाई के घर में हुआ था। उन पर अ..

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महान संघ याने हिन्दुओं की संगठित शक्ति।  हिन्दुओं की संगठित शक्ति इसलिए कि इस देश का भाग्य निर्माता है। वे इसके स्वभाविक स्वामी है।  उनका ही यह देश है और उन पर ही देश का उत्थान और पतन निर्भर है।     - स्वामी विवेकानंद..

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भोपाल(विसंके). बौद्ध मत में दीक्षा लेने के पूर्व उन्होंने कहा था-“देश का यह सबसे बड़ा हित है जो में बोद्धमत अपना रहा हूँ क्योंकि बोद्ध मत भारतीय संस्कृति का ही अंग है. मैनें इस बात का ध्यान रखा है कि मेरा मत परिवर्तन इस भूमि के इतिहास और संस्कृति की परंपरा को कोई हानि न पहुचाएं”अपने हिन्दू कोड बिल के लिए बाबा साहब ने “हिन्दू” शब्द की बहुत व्यापक व्याख्या की थी. इसके अनुसार ईसाई, मुसलमान, पारसी और यहूदियों को छोड़कर देश की सब वैदिक, शैव, जैन, बौद्ध, सिख और वनवासी क्षेत्र की तमाम ..

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सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति आत्मीयता का भाव केवल शब्दों में रहने से काम नहीं चलेगा. आत्मीयता की प्रत्यक्ष अनुभूति होना आवश्यक है समाज के सुख-दुःख यदि हमें छू पाते हैं तो यही मानना चाहिए  कि यह अनुभूति का कोई अंश हमें भी प्राप्त हुआ है.   - परम ..

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हिन्दू जाति का सुख मेरा और मेरे कुटुंब का सुख है. हिन्दू जाति पर आने वाली विपत्ति हम सभी के लिए महासंकट है और हिन्दू जाति का अपमान हम सभी का अपमान है. ऐसी आत्मीयता की वृत्ति हिन्दू समाज के रोम-रोम में व्याप्त होनी चाहिए यही राष्ट्र धर्म का मूल मंत्र है.     -परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार जी..

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भोपाल(विसंके). आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है. असली शत्रु अपने भीतर रहते हैं. वे शत्रु हैं – लालच, द्वेष, क्रोध, घमंड और आसक्ति और नफरत.       - भगवान महावीर..

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छोटी-छोटी बातों को नित्य ध्यान रखें बूंद-बूंद मिलकर ही बड़ा जलाशय बनता है. एक-एक त्रुटी मिलकर ही बड़ी-बड़ी गलतियां होती है. इसलिए शाखाओं में जो शिक्षा मिलती है, उसके किसी भी अंश को नगण्य अथवा कम महत्व का नहीं मानना चाहिए.     - परम पूजनीय गुरु ज..

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महान संघ याने हिन्दुओं की संगठित शक्ति।  हिन्दुओं की संगठित शक्ति इसलिए कि इस देश का भाग्य निर्माता है। वे इसके स्वभाविक स्वामी है।  उनका ही यह देश है और उन पर ही देश का उत्थान और पतन निर्भर है।  -  स्वामी विवेकानंद ..

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” लुढ़कते पत्थर में काई नहीं लगती ” वास्तव में वे धन्य है जो शुरू से ही जीवन का लक्ष्य निर्धारित का लेते है। जीवन की संध्या होते – होते उन्हें बड़ा संतोष मिलता है कि उन्होंने निरूद्देश्य जीवन नहीं जिया तथा लक्ष्य खोजने में अपना समय नहीं गवाया। जीवन उस तीर की तरह होना चाहिए जो लक्ष्य पर सीधा लगता है और निशाना व्यर्थ नहीं जाता।          - स्वामी विवेकानंद ..

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चारों वेद पढ़ा होने पर भी जो दुराचारी है, वह अधमता में शूद्र से भी बढ़कर है. जो अग्निहोत्र में तत्पर और जितेन्द्रिय है, उसे “ब्राह्मण” कहा जाता है.  - महर्षि वेद व्यास (महाभारत )..

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अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं. वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियाँ बनाते हैं.   –महर्षि अरविंद..

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जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कही इतिहास नहीं बना सकती | --डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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एक मूर्ख व्यक्ति को समझाना आसान है, एक बुद्धिमान व्यक्ति को समझाना उससे भी आसान है, लेकिन एक अधूरे ज्ञान से भरे व्यक्ति को भगवान ब्रह्मा भी नही समझा सकते, क्योंकि अधूरा ज्ञान मनुष्य को घमंडी और तर्क के प्रति अँधा बना देता है.       - महा..

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अंग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप हमारी प्रवृत्ति बहिर्मुखी हो गई. साथ ही आजीविका के लिए कलम का सहारा ही प्रमुख होने के कारण हम वीणापाणीके पवित्र सन्देश को भूल गए. हमारी रीति, नीति, विचार,व्यवहार, किसी का भी संबंध गाँवों में फैले करोड़ों लोगों से न रहा. अंग्..

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मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है. इन्हीं में से मेरे कार्यकर्ता मिक्लेंगे जो सिंह की तरह हर समस्या का समाधान कर देंगे. - स्वामी विवेकानन्द..

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मरते दम तक कार्य करते रहो – में तुम्हारे साथ हूँ, और जब में चला जाऊँगा, तो मेरी आत्मा तुम्हारे साथ काम करेगी. धन, नाम, यश और सुखभोग तो केवल दो दिन के है. संसारी कीट की भाँती मरने की अपेक्षा कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का प्रचार करते हुए मर जाना कहीं ..

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जब तक लाखोँ लोग भूखे और अज्ञानी है. तब तक में उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ, जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता.  - स्वामी विवेकानन्द..

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इस देश का प्राण धर्म है, भाषा धर्म है, भाव धर्म है और तुम्हारी राजनीति, समाजनीति, दुर्भिक्षग्रस्त को अन्नदान यह चिरकाल से इस देश में जैसा हुआ है वैसा ही होगा अर्थात धर्म के माध्यम से यह सब होता है तो हो अन्यथा तुम्हारा चिल्लाना व्यर्थ होगा. - स्वामी विवे..

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    आज हमारे देश को आवश्यकता है – लोहे के सामान मांसपेशियों और वज्र के समान स्नायुयों की. हम भूत दिनों तक रो चुके, अब और रोने की आवश्यकता नहीं. अब अपने पैरों पर उठ खड़ें होओं एवं मनुष्य बनो. - स्वामी विवेकानंद ..

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                  हमारे देश की स्त्रियाँ...विद्या, बुद्धि अर्जित करें, यह मैं ह्रदय से चाहता हूँ लेकिन पवित्रता की बलि देकर यदि यह करना पड़े तो कदापि नहीं. - स्वामी विवेकानंद ..

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आप इस भ्रम में न रहें कि लोग हमारी ओर नहीं देखते. वे हमारे कार्य तथा हमारी व्यक्तिगत आचरणों की ओर आलोचनात्मक दृष्टि से देखा करते है. इसीलिए केवल व्यक्तिगत चाल-चलन की दृष्टि से सावधानी बरतने से काम नहीं चलेगा, अपितु सामूहिक एवं सार्वजनिक जीवन में भी हमारा ..

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जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात | रैदास मानुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात || अर्थ :- जाति प्रथा में बहुत पेचीदगियां है जैसे केले के ताने को छीलते जाओ तो पत्ते में पत्ता मिलाता है | सार अंततः कुछ नहीं निकलता | उसी तरह जाति-पाति का कोई सर नहीं है ..

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ये शरीर नश्वर है, हमे इस शरीर के जरिये सिर्फ एक मौका मिला है, खुद को साबित करने का, कि मनुष्यता और आत्मविवेक क्या है...

अमरनाथ यात्रा के मंत्रों, जयकारों पर पाबंदी लगाकर हिंदुओं का अपमान क्यों? वापस ले सरकार - डॉ प्रवीण तोगडिया

अमरनाथ यात्रा के मंत्रों, जयकारों पर पाबंदी लगाकर हिंदुओं का अपमान क्यों? वापस ले सरकार - डॉ प्रवीण तोगडिया..

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मनुष्य कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए उसे हमेशा अपना अतीत याद करते रहना चाहिए-ईश्वरचंद्र विद्यासागर..

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विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है-पंडित दीनदयाल उपाध्याय  ..

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एक मनुष्य का सबसे बड़ा कर्म दूसरो की भलाई, और सहयोग होना चाहिए जो एक सम्पन्न राष्ट्र का निमार्ण करता हैै-ईश्वरचन्द्र विद्यासागर..

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सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना-स्वामी विवेकानंद..

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तुम्हारे ऊपर जो प्रकाश है, उसे पाने का एक ही साधन है – तुम अपने भीतर का आध्यात्मिक दीप जलाओ, पाप और अपवित्रता स्वयं नष्ट हो जायेगी। तुम अपनी आत्मा के उददात रूप का ही चिंतन करो-स्वामी विवेकानंद..

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दूसरों के कल्याण से बढ़कर दूसरा कोई नेक काम और धर्म नही होता - ईश्वरचन्द्र विद्यासागर..

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जो नास्तिक हैं उनको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भगवान में विश्वास करना चाहिए इसी में उनका हित है- इश्वर चन्द्र विद्यासागर..

आज की अभिव्यक्ति

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय l"- संत कबीर अर्थ-जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला l जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है l..

आज की अभिव्यक्ति

धर्म एक बहुत व्यापक अवधारणा है जो समाज को बनाए रखने के जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित है-पंडित दीनदयाल उपाध्याय..

आज की अभिव्यक्ति

मनुष्य कितना भी बङा क्यो न बन जाए उसे हमेशा अपना अतीत याद करते रहना चाहिए- इश्वर चन्द्र विद्यासागर..

आज की अभिव्यक्ति

लगातार पवित्र विचार करते रहे, बुरे संस्कारो को दबाने के लिए एकमात्र समाधान यही है-स्वामी विवेकानंद..