आज की अभिव्यक्ति

आज की अभिव्यक्ति

    अगर हमारी करोड़ों की दौलत भी चली जाए या फिर हमारा पूरा जीवन बलिदान हो जाए तो भी हमें ईश्वर में विश्वास और उसके सत्य पर विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिए।               &..

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      सच्ची शक्ति उसे कहते हैं जिसमें अच्छे गुण, शील, विनम्रता, पवित्रता, परोपकार की प्रेरणा तथा जन –जन के प्रति प्रेम भरा हो. मात्र शारीरिक शक्ति ही शक्ति नहीं कहलाती.               &n..

आज की अभिव्यक्ति

यह जरुरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचते हैं, जिसके बिना आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है.                                     &nbs..

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किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये – आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।                                          ..

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  किसी की निंदा ना करें: अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं. अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये.   - स्वामी विवेकानंद..

आज की अभिव्यक्ती

जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न धाराएँ अपना जल समुद्र में मिला देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है.   - स्वामी विवेकानंद..

आज की अभिव्यक्ती

      बाहर की दुनिया बिलकुल वैसी है, जैसा कि हम अंदर से सोचते हैं। हमारे विचार ही चीजों को सुंदर और बदसूरत बनाते हैं। पूरा संसार हमारे अंदर समाया हुआ है, बस जरूरत है चीजों को सही रोशनी में रखकर देखने की। - स्वामी विवेकानन्द ..

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अगर हम दुनिया के इतिहास को देखे, तो पाएंगे कि सभ्यता का निर्माण उन महान ऋषियों और वैज्ञानिकों के हाथों से हुआ है,जो स्वयं विचार करने की सामर्थ्य रखते हैं,जो देश और काल की गहराइयों में प्रवेश करते हैं,उनके रहस्यों का पता लगाते हैं और इस तरह से प्राप्त ज्ञान का उपयोग विश्व श्रेय या लोक-कल्याण के लिए करते हैं । - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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केवल निर्मल मन वाला व्यक्ति ही जीवन के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकता है. स्वयं के साथ ईमानदारी आध्यात्मिक अखंडता की अनिवार्यता है. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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कोई भी जो स्वयं को सांसारिक गतिविधियों से दूर रखता है और इसके संकटों के प्रति असंवेदनशील है, वास्तवं में बुद्धिमान नहीं हो सकता. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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राष्ट्र, लोगों की तरह सिर्फ जो हांसिल किया उससे नहीं बल्कि जो छोड़ा उससे भी निर्मित होते हैं. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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हमें मानवता की उन नैतिक जड़ों को जरुर याद करना चाहिए जिनसे अच्छी व्यवस्था और स्वतंत्रता दोनों बनी रहे. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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यदि मानव  दानव  बन जाता  है तो ये उसकी  हार  है , यदि मानव महामानव बन जाता है तो ये उसका चमत्कार  है .यदि मनुष्य  मानव  बन जाता है तो ये उसके जीत है . - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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जीवन का सबसे बड़ा उपहार एक उच्च जीवन का सपना है.  - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन  ..

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शांति, राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकते बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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मनुष्य को सिर्फ तकनीकी दक्षता नही बल्कि आत्मा की महानता प्राप्त करने की भी ज़रुरत है. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए जहाँ से अनुशाशन और स्वतंत्रता दोनों का उद्गम हो.  - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बांकी सब कुछ भूल जाओ.  - स्वामी विवेकानंद ..

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शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु हैं । विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु हैं । प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु हैं । - स्वामी विवेकानंद ..

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मेरा यह दृढ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारत में ही किसी निकटवर्ती संबंधी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूँगा क्योंकि मेरा जन्म – जन्मान्तरों में भी यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक साधनों पर समानाधिकार प्राप्त हो. कोई किसी पर हुकूमत न करे .   - शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ..

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सांप्रदायिक सद्भाव की प्रतीक थी राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह की  मित्रता  बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा”. जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ . हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा, और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.” - शहीद अशफाक उल्ला खां..

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यदि किसी के मन में जोश, उमंग या उत्तेजना पैदा हो, तो शीघ्र गावों में जाकर कृषक की दशा को सुधारें | - शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ..

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संसार में जितने भी बड़े आदमी हुए हैं, उनमें से अधिकतर ब्रह्मचर्यं के प्रताप से ही बने हैं | और सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद भी उनका यशोगान करके मनुष्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं | ब्रह्मचर्यं की महिमा यदि जाननी हो तो परशुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भीष्म, बंदा वैरागी, राम कृष्ण, महर्षि दयानंद, विवेकानंद तथा राममूर्ति की जीवनियों का अवश्य अध्ययन करें | शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ..

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छात्र की योग्यता ज्ञान अर्जित करने के प्रति उसके प्रेम, निर्देश पाने की उसकी इच्छा, ज्ञानी और अच्छे व्यक्तियों के प्रति सम्मान, गुरु की सेवा और उनके आदेशों का पालन करने में दिखती है.  - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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संस्कार ही 'मानव' के 'आचरण' की नीव होता है, जितने गहरे 'संस्कार' होते हैं, उतना ही 'अडिग' मनुष्य अपने कर्तव्य, धर्म, सत्य और न्याय पर होता है। - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी, काम करते हुए सोचना सतर्कता और काम करने के बाद सोचना मूर्खता है।  - स्वामी विवेकानंद ..

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जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहलाता है | जो पदार्थ सत्य है उसके गुण, कर्म और स्वभाव भी सत्य होते हैं, जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और विरोधी मत वाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है | इसलिए वह सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता | - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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संस्कार ही ‘मानव’ के ‘आचरण’ की नीव होती है | जितने गहरे ‘संस्कार’ होते हैं, उतना ही “अडिग” मनुष्य अपने कर्त्तव्य पर, अपने धर्म पर, सत्य पर, और न्याय पर होता है | - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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अज्ञानी होना गलत नहीं है, अज्ञानी बने रहना गलत है । - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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हमें पता होना चाहिए कि भाग्य भी कमाया जाता है और थोपा नहीं जाता. ऐसी कोई कृपा नहीं है जो कमाई ना गयी हो. - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिये, आपके पास सर्वश्रेष्ठ लौटकर आएगा | - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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पराजय और असफलता कभी-कभी विजय की ओर जरूरी कदम होते हैं | - लाला लाजपत राय..

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देशभक्ति का निर्माण न्याय और सत्य की दृढ़ चट्टान पर ही किया जा सकता है | लाला लाजपत राय ..

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दूसरों पर विश्वास न रखकर खुद पर विश्वास रखो, आप अपने ही प्रयासों से सफल हो सकते हैं क्योंकि राष्ट्रों का विकास अपने ही बलबूते पर होता है | - लाला लाजपत राय..

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सार्वजनिक जीवन में अनुशासन को बनाए रखना बहुत जरूरी है, वर्ना प्रगति के मार्ग में बाधा कड़ी हो जाएगी |  - लाला लाजपत राय..

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कभी भी उसे तर्क से नही समझा जा सकता है, चाहे तर्क करने में अपने कई सारे जीवन लगा दे | -   श्री गुरुनानक देव ..

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भगवान है लेकिन बस एक, उसका नाम सत्य है, वही निर्माता है, वह किसी से डरता नहीं है, उसके अंदर घृणा नहीं है, वह कभी नहीं मरता है, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से परे है, वह स्वयं प्रकाशित है, उसे सच्चे गुरु की दयालुता के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है. -   श्री गुरुनानक देव  ..

30 नवम्बर - जन्म दिवस / विज्ञान की अमर विभूति जगदीश चंद्र बसु

पेङ पौधौं से संबन्धित सवालों की जिज्ञासा बचपन से लिए, धार्मिक वातावरण में पले, जिज्ञासु जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर, 1858 को बिक्रमपुर हुआ था, जो अब ढाका , बांग्लादेश का हिस्सा है । आपके पिता श्री भगवान सिंह बसु डिप्टी कलेक्टर थे। पेङ-पौधों..

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सच्चा धार्मिक वही है जो सभी लोगो का एक समान रूप से सबका सम्मान करते है -   श्री गुरुनानक देव ..

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रस्सी की अज्ञानता के कारण रस्सी सांप प्रतीत होता है; स्वयं की अज्ञानता के कारण क्षणिक स्थिति भी स्वयं का व्यक्तिगत, सीमित, अभूतपूर्व स्वरूप प्रतीत होती है. -   श्री गुरुनानक देव ..

27 नवम्बर - इतिहास स्मृति / कोटली के अमर बलिदानी स्वयंसेवक

‘ हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’ की पूर्ति के लिए नवनिर्मित पाकिस्तान ने 1947 में ही कश्मीर पर हमला कर दिया। देश रक्षा के दीवाने संघ के स्वयंसेवकों ने उनका प्रबल प्रतिकार किया। उन्होंने भारतीय सेना, शासन तथा जम्मू-कश्मीर ..

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भगवान् है लेकिन बस एक, उसका नाम सत्य है, वही निर्माता है, वह किसी से डरता नहीं है, उसके अंदर घृणा नहीं है, वह कभी नहीं मरता है, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से परे है, वह स्वयं प्रकाशित है, उसे सच्चे गुरु की दयालुता के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है.                                               -   श्री गुरुनानक देव ..

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सन्यास तपस्वी के वस्त्रों में या उनके जैसे रहने में नहीं है. सन्यास केवल शब्दों में भी नहीं है | संन्यासी वह  है, जो हर किसी के साथ समान व्यवहार करता है. अशुद्धता के बीच शुद्ध रहना ही सन्यास है ।                                       -   श्री गुरुनानक देव ..

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“वह सब कुछ है लेकिन भगवान केवल एक ही है. उसका नाम सत्य है, रचनात्मकता उसकी शख्सियत है और अनश्वर ही उसका स्वरुप है. जिसमे जरा भी डर नही, जो द्वेष भाव से पराया है. गुरु की दया से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है.”      &n..

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अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: प्रतिद्वंदी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है . लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाएं ? तभी हमें आत्म -बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम ..

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पंथ, सम्प्रदाय, मजहब अनेक हो सकते हैं,  किन्तु धर्म तो एक ही होता है | यदि पंथ- सम्प्रदाय उस एक ईश्वर की उपासना के लिए प्रेरणा देते हैं तो ठीक है | अन्यथा शक्ति का बाना पहनकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना  न धर्म है और न ही ईश्वर भक्ति है | - शहीद भगत सिंह ..

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त्याग निश्चय ही आपके बल को बढ़ा देता है, आपकी शक्तियों को कई गुना कर देता है, आपके पराक्रम को दृढ कर देता है, वही आपको ईश्वर बना देता है । वह आपकी चिंताएं और भय हर लेता है, आप निर्भय तथा आनंदमय हो जाते हैं । - स्वामी रामतीर्थ..

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केवल प्रकाश का अभाव ही अंधकार नहीं, प्रकाश की अति भी मनुष्य की आँखों के लिए अंधकार है ।  - स्वामी रामतीर्थ..

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दुनियावादी चीजों में सुख की तलाश, फिजूल होती है। आनन्‍द का खजाना, तो कहीं हमारे भीतर ही है। - स्‍वामी रामतीर्थ..

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जब तक तुम्‍हारें अन्‍दर दूसरों के, अवगुण ढूँढने या उनके दोष देखने, की आदत मौजूद है ईश्‍वर का साक्षात्कार, करना अत्‍यंत कठिन है ।  - स्‍वामी रामतीर्थ..

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हम कर्म के द्वारा अपने जीवन को, आत्मा को प्रकट करते हैं | चित्रकार को चित्र बनाने से, कवि को कवि कर्म से रोक दीजिये तो वह मर जाएगा | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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मतदान का अधिकार आपके सद्विचार और आपके सद्विवेक की कसौटी है | अतः उस ओर से उदासीन न हों , उसे बेचें नहीं और न उसे नष्ट होने दें |..

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हर देशभक्त भारतीय का कर्तव्य है की वह इस बात पर नजर रखे की कम्मुनिस्टो को ऐसी शक्ति प्राप्त ना होने पाए की वे किसी दिन भारत की स्वतंत्रता और सुरक्षा को ही गंभीर खतरे में डाल सकें | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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आलस्य छोड़िये और बेकार मत बैठिये क्योंकि हर समय काम करने वाला अपनी इन्द्रियों को आसानी से वश में कर लेता है। - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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"यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे की उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। हर एक भारतीय को अब यह भूल जाना चाहिए कि वह एक राजपूत है, एक सिख या जाट है। उसे यह याद होना चाहिए कि वह एक भारतीय है और उसे इस देश में हर अधिकार है पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं।" लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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"शक्ति के अभाव में विश्वास व्यर्थ है। विश्वास और शक्ति, दोनों किसी महान काम को करने के लिए आवश्यक हैं।"   लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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“जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासन भी नहीं टिक सकता। अतः जात-पांत के ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सब एक हो जाइए.” लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

31 अक्तूबर - जन्म दिवस / लौहपुरुष सरदार पटेल

15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों ने भारत को स्वाधीन तो कर दिया; पर जाते हुए वे गृहयुद्ध एवं अव्यवस्था के बीज भी बो गये। उन्होंने भारत के 600 से भी अधिक रजवाड़ों को भारत में मिलने या न मिलने की स्वतन्त्रता दे दी। अधिकांश रजवाड़े तो भारत में स्वेच्छा से मिल गये;..

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हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण मात्र नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व् सक्षम बनाना है | उसके आधार पर राष्ट्र की धारणा हो और हमारा समाज स्वस्थ एवं विकासोन्मुख जीवन व्यतीत कर सके, इसकी व्यवस्था करनी है | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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यदि यन्त्र मानव का स्थान लेकर उसे भूखा मारे तो वह उन उद्देश्यों के विपरीत होगा, जिनकी सिद्धि के लिए यन्त्र का आविष्कार हुआ | जड़ मशीन इसकी दोषी नहीं है | यह बुराई उस अर्थव्यवस्था की है, जिसमे विवेक लुप्त हो जाता है  | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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मतदान का अधिकार आपके सद्विचार और आपके सद्विवेक की कसौटी है | अतः उस ओर से उदासीन न हों , उसे बेचें नहीं और न उसे नष्ट होने दें | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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असंयम और गैर-जिम्मेदारी साथ साथ चलते हैं | लोकराज्य तभी सफल हो सकता है जब नागरिक अपनी जिम्मेदारी को समझेगा और उसका निर्वाह करने के लिए क्रियाशील रहेगा | समाज जितना यह समझता जाएगा की राज्य चलाने की जिम्मेदारी उसकी है , उतना ही वह संयमशील बनता चला जाएगा | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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मर्यादाओं के अंतर्गत क्रिया का नाम संयम है | भूखा मरना संयम नहीं; अपितु शरीर की आवश्यकता के अनुरूप गुण और मात्र में भोजन करना संयम है | बिलकुल ना बोलना, यहाँ तक की अत्याचारों के विरुद्ध आवाज भी ना उठाना अथवा किसी को सत्परामर्श भी ना देना , संयम नहीं | वाचाल और गूंगे के बीच संयमी पुरुष आता है, जो आवश्यकता पढने पर बोलता है और अवश्य बोलता है |                                              ..

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जिस व्यवस्था में आर्थिक क्षमता तो बढ़े, किन्तु मानवता के अन्य अंगों के विकास की शक्ति कुंठित हो जाय, वह कल्याणकारी नहीं हो सकती | मानव ही हमारी व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए |              ..

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पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन दो अलग - अलग चीजें  हैं. जहाँ पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है ; और यदि हमें आगे बढ़ना है तो इसे हमारे द्वारा अवश्य अपनाया जाना चाहिए, वहीँ पश्चिमी जीवन और मूल्यों के बारे में ये बात सत्य नहीं है .   ..

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विश्व ऐसी स्थिति में नही है की हमारा कुछ मार्गदर्शन कर सके | वह तो स्वयं चौराहे पर है | ऐसी अवस्था में हम उससे किसी प्रकार का मार्गदर्शन नहीं पा सकते | हमें तो यह सोचना चाहिए की अब तक की विश्व की प्रगति देखते हुए कही ऐसी भी सम्भावना है या नहीं की हम उसक..

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जब तक पूरा भारत उठ कर खड़ा नहीं होगा, संसार में कोई हमारा आदर नहीं करेगा | इस दुनियाँ में दर की कोई जगह नहीं है केवल शक्ति की पूजा होती है | - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम..

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रचनात्मक नेतृत्व अपनी परम्परागत भूमिका से हटकर, कमांडर के स्थान पर कोच और प्रबंधक के स्थान पर, पथप्रदर्शक का काम करता है | - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम..

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भगवान, हमारे निर्माता ने हमारे मष्तिष्क और व्यक्तित्व में असीमित शक्तियां और क्षमताएं दी हैं। ईश्वर की प्रार्थना हमें इन शक्तियों को विकसित करने में मदद करती है । - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम..

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जाति अवसर को सीमित करती है. सीमित अवसर क्षमता को संकुचित करता है. संकुचित क्षमता अवसर को और भी सीमित कर देती है. जहाँ जाति का प्रचलन है, वहां अवसर और क्षमता हमेशा से सिकुड़ रहे कुछ लोगों के दायरे तक सीमित है. डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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अगर भारत बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी का प्रयोग करता है, तो करोड़ों लोगों को ख़त्म करने की आवश्यकता पड़ेगी | राम मनोहर लोहिया ..

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"मैं राजा राम का नहीं वनवासी राम का पूजक हूँ” | - विराट पुरुष नानाजी देशमुख ..

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मुझे सत्य का पालन करना पसंद है; बल्कि, मैंने औरों को उनके अपने भले के लिए सत्य से प्रेम करने और मिथ्या को त्यागने के लिए राजी करने को अपना कर्त्तव्य बना लिया है. अतः अधर्म का अंत मेरे जीवन का उदेश्य है. स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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मानव को अपने पल-पल को 'आत्मचिन्तन' मे लगाना चाहिए, क्योंकि हर क्षण हम 'परमेश्वर' द्वारा दिया गया 'समय' खो रहे है. -  - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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यदि कोई एक व्यक्ति को भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सर शर्म से झुकाना पड़ेगा . लालबहादुर शास्त्री ..

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हम सभी को अपने - अपने  क्षत्रों में उसी समर्पण , उसी उत्साह, और उसी संकल्प के साथ काम करना होगा जो रणभूमि में एक योद्धा को प्रेरित और उत्साहित करती है. और यह सिर्फ बोलना नहीं है, बल्कि वास्तविकता में कर के दिखाना है. लालबहादुर शास्त्री &n..

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यदि लगातार झगड़े होते रहेंगे तथा शत्रुता होती रहेगी तो हमारी जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा । परस्पर लड़ने की बजाय हमें गरीबी, बीमारी और अज्ञानता से लड़ना चाहिए । दोनों देशों की आम जनता की समस्याएं, आशाएं और आकांक्षाएं एक समान हैं । उन्हें लड़ाई-झगड़ा और गोला-बारूद नहीं, बल्कि रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता है । लालबहादुर शास्त्री ..

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यदि मैं एक तानाशाह होता तो धर्म और राष्ट्र अलग - अलग होते । मैं धर्म के लिए जान तक दे दूंगा । लेकिन यह मेरा निजी मामला है । राज्य का इससे कुछ लेना देना नहीं है । राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष कल्याण, स्वास्थ्य, संचार, विदेशी संबंधो, मुद्रा इत्यादि का ध्यान रखेगा..

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भ्रष्टाचार को पकड़ना बहुत कठिन काम है, लेकिन मैं पूरे जोर के साथ कहता हूँ कि यदि हम इस समस्या से गंभीरता और दृढ संकल्प के साथ नहीं निपटते तो हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में असफल होंगे. - लाल बहादुर शास्त्री..

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चलिए सुबह का पहला काम ये करें कि इस दिन के लिए संकल्प करें कि- मैं दुनिया में किसी से डरूंगा नहीं.- मैं केवल भगवान से डरूं । मैं किसी के प्रति बुरा भाव ना रखूं । मैं किसी के अन्याय के समक्ष झुकूं नहीं । मैं असत्य को सत्य से जीतुं । और असत्य का विरोध करते ..

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स्वदेशी की कल्पना बीते युग की तथा प्रतिगामीपन की घोतक समझी जाती है | विदेशों की हर वास्तु हम बड़े चाव से ले रहे हैं | विचार,व्यवस्था, पद्दति, पूंजी, उत्पादन प्रणाली, प्रौद्योगिकी तथा उपभोग के मानदंड - सभी क्षेत्रों में हम विदेशों पर निर्भर हैं | यह प्रगति ..

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हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण मात्र नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाना है | उसके आधार पर राष्ट्र की धारणा हो और हमारा समाज स्वस्थ एवं विकासोन्मुख जीवन व्यतीत कर सके, इसकी व्यवस्था करनी है | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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भारतीय परंपरा मानव को 'एकात्म' मानती हैं | एकात्म, यानी जिसको बांटा नहीं जा सकता | न बांटी जा सकने वाली इकाई को 'एकात्म' कहते हैं | समाज और व्यक्ति इस प्रकार जुड़े हुए हैं, उन्हें अलग अलग नहीं किया जा सकता | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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जिसकी लाठी उसकी भैंस - जंगल का विधान है | मानव की सभ्यता का विकास इस विधान को मानकर नही, बल्कि यह विधान न चल पाए इस व्यवस्था के कारण ही सभ्यता का विकास हुआ है | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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हे भारत माता देश के हर नागरिक को राम की मर्यादा, कृष्ण की उन्मुक्तता और शिव के असीमित मष्तिस्क से गढ़ों |   डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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भारतीय राजनीति में अच्छाई और सच्चाई तभी देखने को मिल सकती है जब लोग चेहरे और पार्टी से से नही बल्कि कार्यो से लोगो की पहचान, तारीफ और आलोचना करे | डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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जाति प्रथा को तोड़ने का एक ही उपाय है वह है ऊची और नीची जातियों के बीच बराबर के हिस्से का रोटी और बेटी का सम्बन्ध | - डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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अंग्रेजी का इतना दबदबा कहीं नहीं है. इसीलिए भारत आजाद होते हुए भी गुलाम है. - डॉ. राम मनोहर लोहिया..

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मर्यादा केवल न करने की नहीं होती है, करने की भी होती है. बुरे की लकीर मत लांघो, लेकिन अच्छे की लकीर तक चहल पहल होनी चाहिए. डॉ. राममनोहर लोहिया ..

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अंग्रेजी का प्रयोग मौलिक सोच में अवरोध है, हीनता की भावनाओं का प्रजनक है और शिक्षित एवं अशिक्षित जनता के बीच की दूरी है. आइये, हम हिंदी की असल प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के लिए संगठित हो जाएं. - डॉ. राममनोहर लोहिया ..

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मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्छा है, मेरे बताए हुए रास्ते पर चलें ।    - डॉ. भीमराव आंबेडकर ..

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जब तक आप सामाजिक स्ववतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी हैं । - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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"भला हम भगवान को खोजने कहां जा सकते हैं अगर उसे अपने दिल और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते." - स्वामी विवेकानंद..

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जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है.  स्वामी विवेकानंद ..

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एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है. - महात्मा गाँधी..

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राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये । - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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जो कौम अपना इतिहास तक नही जानती है, वे कौम कभी अपना इतिहास भी नही बना सकती है | - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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  डॉक्टर और गुरु के सामने झूठ मत बोलिए क्योकि यह झूठ बहुत महंगा पड़ सकता हैं | गुरु के सामने झूठ बोलने से पाप का प्रायश्चित नहीं होंगा, डॉक्टर के सामने झूठ बोलने से रोग का निदान नहीं होंगा | डॉक्टर और गुरु के सामने एकदम सरल और तरल बनकर पेश हो | आप कि..

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गुलाब कांटों में भी हंसता है गुलाब कांटों में भी हंसता है इसलिए लोग उसे प्रेम करते हैं, तुम भी ऐसे काम करो कि तुमसे नफरत करने वाले लोग भी तुमसे प्रेम करने पर विवश हो जायें।              &n..