आज की अभिव्यक्ति

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संसार को हिन्दू जाति का आदेश सुनना पड़े- ऐसी अवस्था उपस्थित होने पर उनका वह आदेश गीता और गौतम बुद्ध के आदेशों से भिन्न नहीं होगा | -वीर सावरकर  ..

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बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए . -डॉ. भीमराव आंबेडकर (बाबा साहेब) ..

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संत सुनी - समझी बातों का आख्यान नहीं करते, वे तो आँखों देखी बातें करते हैं. अपनी अनुभूतियों का निचोड़ दूसरों के हृदय में उतारते हैं. -रामधारी सिंह दिनकर ..

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“हमारी ताकत और स्थिरता के लिए हमारे सामने जो जरूरी काम हैं उसमें लोगों में एकता और एकजुटता स्थापित करने से बढ़ कर कोई काम नहीं है |” -लाल बहादुर शास्त्री ..

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दूसरों पर विश्वास न रखकर स्वयं पर विश्वास रखो. आप अपने ही प्रयत्नों से सफल हो सकते हैं क्योंकि राष्ट्रों का निर्माण अपने बलबूते पर होता है . -लाला लाजपत राय..

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भविष्य साधारण लोगों के असाधारण दृढ़ संकल्प से सम्बंधित है | -मुरलीधर देविदास आमटे (बाब आमटे)..

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मनुष्य के लिए कदाचित अशोभनीय है कि वह मनुष्य - निर्मित संकटों से भयभीत रहे | - माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरूजी) ..

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छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता | -अटल बिहारी वाजपेयी  ..

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दूसरों की गलतियों से सीखना ही सबसे बड़ा आंकलन है | -महात्मा ज्योतिबा फुले ..

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किसी भी समय जीवन मुश्किल बन सकता है और किसी भी समय जीवन बहुत आसान बन सकता है यह सब हमारे जीवन के समायोजन पर निर्भर करता है |  -मोरारजी देसाई..

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एक राष्ट्र लोगों का एक समूह होता है जो ‘एक लक्ष्य’, ‘एक आदर्श’, ‘एक मिशन’ के साथ जीते हैं और एक विशेष भूभाग को अपनी मातृभूमि के रूप में देखते हैं | यदि आदर्श या मातृभूमि दोनों में से किसी का भी लोप हो तो एक राष्ट्र संभव नहीं हो सकता | -पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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“यदि आप सपने में जी रहे हैं तो यह आपकी प्रगति के मार्ग में रूकावट का कारण बनता है |” -मुरलीधर देविदास आमटे (बाबा आमटे) ..

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मनुष्य के आत्मविश्वास में और अहंकार में अंतर करना कई बार कठिन होता है | - माधव सदाशिवराव गिल्वालकर (श्री गुरूजी )..

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धर्म और व्यावहारिक जीवन अलग नहीं हैं | सन्यास लेना जीवन का परित्याग करना नहीं है | असली भावना सिर्फ अपने लिए काम करने की बजे देश को अपना परिवार बना मिलजुल कर कम करना है | इसके बाद का कदम मानवता की सेवा करना है और अगला कदम इश्वर की सेवा करना है |  - ..

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बेशक कर्म पूजा है किन्तु हास्य जीवन है। जो कोई भी अपना जीवन बहुत गंभीरता से लेता है उसे एक तुच्छ जीवन के लिए तैयार रहना चाहिए। जो कोई भी सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीता है।         &n..

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  “किसी भी इन्सान को मरना आसान है, परन्तु उसके विचारों को नहीं| महँ साम्राज्य टूट जाते हैं, तबाह हो जाते हैं, जबकि उनके विचार बाख जाते है|” - भगत सिंह ..

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देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है, और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है | - लाल बहादुर शास्त्री ..

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  देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है, और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है । - लाल बहादुर शास्त्री ..

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इस बात से कभी वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती कि हम वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त किये बिना अंधों की भांति इधर-उधर भटकते फिरें | - माधवराव सदाशिव गोलवलकर "श्रगुरुजी"..

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हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण, जिसमें नर का तेज प्रखर था नारी का मान | एक नयन संजीवन जिनका कठिन खडग था, कर में उतना ही अंतर कोमल | थर-थर तीनों लोक कांपते थे जिनकी ललकारों पर, स्वर्ग नाचता था रन में जिनकी पवित्र तलवारों पर हम उन वीरों की स..

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भारत में नैतिकता के सिद्धांतों को धर्म के रूप में माना जाता है – यानि जीवन के नियम ।                            पं. दीनदयाल उपाध्याय  ..

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    दोहा – करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो      आस          कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास ।।   हिन्दी अर्थ – रविदास जी कहते हैं कि हमें हमेशा अपने कर्म में लगे ..

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  सबसे पहले आपको अपने दिल में भाला लेना है यानी खुद को इतना कठोर बनाना है कि कठिनाईयों का डटकर सामना करे तभी आप आपने सिर पर सफलता का मुकुट पहन सकते है । - बाबा आमटे ..

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इंसान तभी कुछ करता है जब वो अपने काम के औचित्य को लेकर सुनिश्चित होता है, जैसाकि हम विधानसभा में बम फेंकने को लेकर थे । - भगत सिंह ..

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  हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं, विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं। - स्वामी विवेकानंद ..

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ब्राह्मणों से चाण्डाल तक सारे-के-सारे हिन्दू समाज की हड्डियों में प्रवेश कर यह जाति-अहंकार उसे चूस रहा है और पूरा हिन्दू समाज इस जाति–अहंकारगत द्वेष के कारण जाति कलह के यक्ष्मा की प्रबलता से जीर्ण–शीर्ण हो गया है ।    - वीर साव..

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मानव के ह्रदय में यदि यह भाव आ जाए कि विश्व में सब कुछ भगवत्स्वरूप है तो घृणा का भाव सदैव ही लुप्त हो जाता है | - परमपूजनीय गुरूजी ..

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जाओ जाकर पढ़ो लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती काम करो-ज्ञान धन इकठ्ठा करो ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है इसलिए, खली ना बैठो, जाओ, जाकर शिक्षा लो दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का नत करो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है इसलिए सीखोई और जाती के बंधन तोड़ दो |  - सावित्रीबाई फुले..

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हमारे राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है सिर्फ भारत नहीं, इसमें सिर्फ माता शब्द हटा लीजिये तो भारत मात्र एक जमीन का टुकड़ा बनकर रह जायेगा |  - पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी ऊँचा दिखाई देता है, जड़ में खड़ा आदमी नीचा दिखाई देता है | न आदमी ऊँचा होता है, न नीचा होता है, न बड़ा होता है, न छोटा होता है – आदमी सिर्फ आदमी होता है |  - अटल बिहारी वाजपेयी ..

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जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर भी विश्वास नहीं कर सकते | - स्वामी विवेकानंद ..

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में एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है उससे मुझे मतलब है | -  भगत सिंह ..

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आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए, मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके । सुभाष चन्द्र बोस ..

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  अपने देश की आजादी की रक्षा करना केवल सैनिकों का काम नहीं, यह पूरे देश का कर्तव्य है । - लाल बहादुर शास्त्री ..

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पड़ोसी कहते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती, हमने कहा कि चुटकी तो बज सकती है ।                        - अटल बिहारी वाजपेयी ..

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  आप यह हमेशा नहीं चुन सकते की कौन आपके जीवन में आएगा, लेकिन जो भी हो आप उनसे हमेशा शिक्षा ले सकते हो वह आपको हमेशा एक सीख ही देगा।                                ..

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  "ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है, दूसरों के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं ।” भगत सिंह ..

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  बीज की एक इकाई विभिन्न रूपों में प्रकट होती है – जड़ें, तना, शाखाएं, पत्तियां, फूल और फल। इन सबके रंग और गुण अलग-अलग होते हैं, फिर भी बीज के द्वारा हम इन सबके एकत्व के रिश्ते को पहचान लेते हैं।            ..

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    रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच हिन्दी अर्थ :- रविदास जी कहते है कि सिर्फ जन्म लेने से कोई नीच नहीं बन जाता है। इंसान के कर्म ही उसे नीच बनाते है। ..

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  बाहर की दुनिया बिल्कुल वैसी है, जैसा कि हम अंदर से सोचते हैं। हमारे विचार ही चीजों को सुंदर और बदसूरत बनाते हैं। पूरा संसार हमारे अंदर समाया हुआ है, बस जरूरत है चीजों को सही रोशनी में रखकर देखने की। - स्वामी विवेकानंद ..

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यदि मैं एक तानाशाह होता तो धर्म और राष्ट्र अलग-अलग होते। मैं धर्म के लिए जान तक दे दूंगा लेकिन यह मेरा निजी मामला है ।राज्य का इससे कोई लेना देना नहीं है। राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष कल्याण, स्वास्थ्य, संचार, विदेशी संबंधों , मुद्रा इत्यादि का ध्यान रखेगा, ल..

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  शहीदों का रक्त अभी गीला है और चिता की राख में चिंगारियां बाकी हैं। उजड़े हुए सुहाग और जंजीरों में जकड़ी हुई जवानियाँ उन उग्त्याचारों की गवाह हैं।                             ..

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  जो व्यक्ति भी विकास के लिए खड़ा है उसे हर एक रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी , उसमे अविश्वास करना होगा तथा उसे चुनौती देनी होगी. - भगत सिंह   ..

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  यदि भारत को बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में वर्णित करने की प्रवृत्ति को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो भारत के अनेक टुकड़ों में बंट जाने का खतरा पैदा हो जाएगा । - अटल बिहारी वाजपेयी  ..

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  सेवा करने का वास्तविक अर्थ है – हृदय की शुद्धि; अहंभावना का विनाश; सर्वत्र ईश्वरत्व की अनुभूति तथा शांति की प्राप्ति। - माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) ..

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एक कुशल कप्तान कभी भी डूबते हुए जहाज का साथ नहीं छोड़ता है ,ऐसे देश को भी डूबने से बचाने के लिए बहादुर नाविकों को उभरना चाहिए । - मुरलीधर देविदास आमटे(बाबा आमटे)   ..

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  हम सभी को अपने-अपने क्षेत्रों में उसी समर्पण , उसी उत्साह और उसी संकल्प के साथ काम करना होगा जो रणभूमि में एक योद्धा को प्रेरित और उत्साहित करता है। यह सिर्फ बोलना नहीं है बल्कि वास्तविकता में कर के दिखाना है। -लाल बहादुर शास्त्री  ..

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  आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिए अपनी आँखों को क्रोध से लाल होने दीजिये, और अन्याय का मजबूत हाथों से सामना कीजिये । - सरदार वल्लभभाई पटेल   ..

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      पौरुष, पराक्रम, वीरता हमारे रक्त के रंग में मिली है । यह हमारी महान परंपरा का अंग है । यह संस्कारों द्वारा हमारे जीवन में ढाली जाती है । - अटल बिहारी वाजपेयी  ..

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    परतंत्रता तथा दासता को प्रत्येक सद्धर्म ने सर्वदा धिक्कारा है। धर्म के उच्छेद और ईश्वर की इच्छा के खंडन को ही परतंत्रता कहते हैं। सभी परतंत्राओं से निकृष्टतम परतंत्रता है – राजनीतिक परतंत्रता और यही नर्क का द्वार है। - विना..

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पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन शैली दो अलग-अलग चीजें हैं। चूँकि पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है और हमें आगे बढ़ने के लिए इसे अपनाना चाहिए, लेकिन पश्चिमी जीवनशैली और मूल्यों के सन्दर्भ में यह सच नहीं है। -पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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  मैं इस बात पर जोर देता हूँ कि मैं महत्त्वाकांक्षा , आशा और जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ। पर मैं ज़रुरत पड़ने पर ये सब त्याग सकता हूँ, और वही सच्चा बलिदान है। - भगत सिंह ..

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    स्वतन्त्रता तो उसी को कहेंगे जिसके अस्तित्व में आने पर हम अपनी आत्मा का, राष्ट्रीय आत्मा का दर्शन करने में तथा स्वयं को व्यक्त करने में सामर्थ्यवान हों . - माधव सदाशिव गोलवलकर(गुरुजी) ..

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  कंधे-से-कंधा लगाकर, कदम-से-कदम मिलाकर हमें अपनी जीवन-यात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है । भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है,हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित है । - अटल बिहारी वाजपेयी  ..

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    उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंदजीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहींहो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो।              &..

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जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब हमने उनके विरोध में गर्व का अनुभव किया, लेकिन हैरत की बात है कि अब जबकि अंग्रेज चले गए हैं, पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन गया है.                         &n..

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आम तौर पर लोग चीजें जैसी हैं उसके आदि हो जाते हैं और बदलाव के विचार से ही कांपने लगते हैं। हमें इसी निष्क्रियता की भावना को क्रांतिकारी भावना से बदलने की ज़रुरत है.                         &nb..

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  मनुष्य मनुष्य के सम्बन्ध अच्छे रहें , साम्प्रदायिक सद्भाव बना रहे, मजहब का शोषण न किया जाए, जाति के आधार पर लोगों की हीन भावना को उत्तेजित न किया जाए, इसमें कोई मतभेद नहीं है ।                   &nbs..

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  दूसरों पर विश्वास न करके स्वयं पर विश्वास रखो । आप अपने ही प्रयत्नों से सफल हो सकते हैं क्योंकी राष्ट्रों का निर्माण अपने ही बलबूते पर होता है ।                             &..

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  कभी मत सोचिए कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है . ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है . अगर कोई पाप है , तो वो यही है ; ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं .                           ..

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मानव स्वयं पर अनुशासन के कठोरतम बंधन तब बड़े आनंद से स्वीकार करता है , जब उसे यह अनुभूती होती है कि उसके द्वारा कोई महान कार्य होने जा रहा है ।                              &nbs..

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मैं हिन्दू परंपरा में गर्व महसूस करता हूं लेकिन मुझे भारतीय परंपरा में और ज्यादा गर्व है । जलना होगा , गलना होगा । कदम मिलाकर चलना होगा ।                                 ..

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    "ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं. हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिलेगी,  हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए."                  ..

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    अगर हमारी करोड़ों की दौलत भी चली जाए या फिर हमारा पूरा जीवन बलिदान हो जाए तो भी हमें ईश्वर में विश्वास और उसके सत्य पर विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिए।               &..

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      सच्ची शक्ति उसे कहते हैं जिसमें अच्छे गुण, शील, विनम्रता, पवित्रता, परोपकार की प्रेरणा तथा जन –जन के प्रति प्रेम भरा हो. मात्र शारीरिक शक्ति ही शक्ति नहीं कहलाती.               &n..

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यह जरुरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचते हैं, जिसके बिना आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है.                                     &nbs..

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किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये – आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।                                          ..

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  किसी की निंदा ना करें: अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं. अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये.   - स्वामी विवेकानंद..

आज की अभिव्यक्ती

जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न धाराएँ अपना जल समुद्र में मिला देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है.   - स्वामी विवेकानंद..

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      बाहर की दुनिया बिलकुल वैसी है, जैसा कि हम अंदर से सोचते हैं। हमारे विचार ही चीजों को सुंदर और बदसूरत बनाते हैं। पूरा संसार हमारे अंदर समाया हुआ है, बस जरूरत है चीजों को सही रोशनी में रखकर देखने की। - स्वामी विवेकानन्द ..

आज की अभिव्यक्ति

अगर हम दुनिया के इतिहास को देखे, तो पाएंगे कि सभ्यता का निर्माण उन महान ऋषियों और वैज्ञानिकों के हाथों से हुआ है,जो स्वयं विचार करने की सामर्थ्य रखते हैं,जो देश और काल की गहराइयों में प्रवेश करते हैं,उनके रहस्यों का पता लगाते हैं और इस तरह से प्राप्त ज्ञान का उपयोग विश्व श्रेय या लोक-कल्याण के लिए करते हैं । - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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केवल निर्मल मन वाला व्यक्ति ही जीवन के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकता है. स्वयं के साथ ईमानदारी आध्यात्मिक अखंडता की अनिवार्यता है. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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कोई भी जो स्वयं को सांसारिक गतिविधियों से दूर रखता है और इसके संकटों के प्रति असंवेदनशील है, वास्तवं में बुद्धिमान नहीं हो सकता. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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राष्ट्र, लोगों की तरह सिर्फ जो हांसिल किया उससे नहीं बल्कि जो छोड़ा उससे भी निर्मित होते हैं. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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हमें मानवता की उन नैतिक जड़ों को जरुर याद करना चाहिए जिनसे अच्छी व्यवस्था और स्वतंत्रता दोनों बनी रहे. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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यदि मानव  दानव  बन जाता  है तो ये उसकी  हार  है , यदि मानव महामानव बन जाता है तो ये उसका चमत्कार  है .यदि मनुष्य  मानव  बन जाता है तो ये उसके जीत है . - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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जीवन का सबसे बड़ा उपहार एक उच्च जीवन का सपना है.  - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन  ..

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शांति, राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकते बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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मनुष्य को सिर्फ तकनीकी दक्षता नही बल्कि आत्मा की महानता प्राप्त करने की भी ज़रुरत है. - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए जहाँ से अनुशाशन और स्वतंत्रता दोनों का उद्गम हो.  - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन..

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समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बांकी सब कुछ भूल जाओ.  - स्वामी विवेकानंद ..

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शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु हैं । विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु हैं । प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु हैं । - स्वामी विवेकानंद ..

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मेरा यह दृढ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारत में ही किसी निकटवर्ती संबंधी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूँगा क्योंकि मेरा जन्म – जन्मान्तरों में भी यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक साधनों पर समानाधिकार प्राप्त हो. कोई किसी पर हुकूमत न करे .   - शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ..

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सांप्रदायिक सद्भाव की प्रतीक थी राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह की  मित्रता  बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा”. जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ . हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा, और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.” - शहीद अशफाक उल्ला खां..

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यदि किसी के मन में जोश, उमंग या उत्तेजना पैदा हो, तो शीघ्र गावों में जाकर कृषक की दशा को सुधारें | - शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ..

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संसार में जितने भी बड़े आदमी हुए हैं, उनमें से अधिकतर ब्रह्मचर्यं के प्रताप से ही बने हैं | और सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद भी उनका यशोगान करके मनुष्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं | ब्रह्मचर्यं की महिमा यदि जाननी हो तो परशुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भीष्म, बंदा वैरागी, राम कृष्ण, महर्षि दयानंद, विवेकानंद तथा राममूर्ति की जीवनियों का अवश्य अध्ययन करें | शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ..

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छात्र की योग्यता ज्ञान अर्जित करने के प्रति उसके प्रेम, निर्देश पाने की उसकी इच्छा, ज्ञानी और अच्छे व्यक्तियों के प्रति सम्मान, गुरु की सेवा और उनके आदेशों का पालन करने में दिखती है.  - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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संस्कार ही 'मानव' के 'आचरण' की नीव होता है, जितने गहरे 'संस्कार' होते हैं, उतना ही 'अडिग' मनुष्य अपने कर्तव्य, धर्म, सत्य और न्याय पर होता है। - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी, काम करते हुए सोचना सतर्कता और काम करने के बाद सोचना मूर्खता है।  - स्वामी विवेकानंद ..

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जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहलाता है | जो पदार्थ सत्य है उसके गुण, कर्म और स्वभाव भी सत्य होते हैं, जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और विरोधी मत वाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है | इसलिए वह सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता | - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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संस्कार ही ‘मानव’ के ‘आचरण’ की नीव होती है | जितने गहरे ‘संस्कार’ होते हैं, उतना ही “अडिग” मनुष्य अपने कर्त्तव्य पर, अपने धर्म पर, सत्य पर, और न्याय पर होता है | - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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अज्ञानी होना गलत नहीं है, अज्ञानी बने रहना गलत है । - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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हमें पता होना चाहिए कि भाग्य भी कमाया जाता है और थोपा नहीं जाता. ऐसी कोई कृपा नहीं है जो कमाई ना गयी हो. - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिये, आपके पास सर्वश्रेष्ठ लौटकर आएगा | - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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पराजय और असफलता कभी-कभी विजय की ओर जरूरी कदम होते हैं | - लाला लाजपत राय..

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देशभक्ति का निर्माण न्याय और सत्य की दृढ़ चट्टान पर ही किया जा सकता है | लाला लाजपत राय ..

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दूसरों पर विश्वास न रखकर खुद पर विश्वास रखो, आप अपने ही प्रयासों से सफल हो सकते हैं क्योंकि राष्ट्रों का विकास अपने ही बलबूते पर होता है | - लाला लाजपत राय..