आज की अभिव्यक्ति

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हमें स्मरण रखना होगा की एक अयोग्य उम्मीदवार इस आधार पर हमारा मत प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है क्योंकि उसका सम्बन्ध एक अच्छे दल से है | यह संभव है की इसे अयोग्य व्यक्ति को अपना टिकट प्रदान करते समय उस दल ने संस्था के लाभ से प्रभावित होकर ऐंसा निर्णय लिया हो या ऐसी मंशा न होने के बाद भी उससे निर्णय की भूल हुई हो | अतः उत्तरदायी मतदाता का अब यह कार्य हो जाता है की वह अपनी जागरूकता का परिचय देकर उक्त गलती को दुरुस्त कर दे |  - पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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हर देशभक्त भारतीय का कर्तव्य है की वह इस बात पर नजर रखे की कम्मुनिस्टो को ऐसी शक्ति प्राप्त ना होने पाए की वे किसी दिन भारत की स्वतंत्रता और सुरक्षा को ही गंभीर खतरे में डाल सकें | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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आलस्य छोड़िये और बेकार मत बैठिये क्योंकि हर समय काम करने वाला अपनी इन्द्रियों को आसानी से वश में कर लेता है। - लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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"यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे की उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। हर एक भारतीय को अब यह भूल जाना चाहिए कि वह एक राजपूत है, एक सिख या जाट है। उसे यह याद होना चाहिए कि वह एक भारतीय है और उसे इस देश में हर अधिकार है पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं।" लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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"शक्ति के अभाव में विश्वास व्यर्थ है। विश्वास और शक्ति, दोनों किसी महान काम को करने के लिए आवश्यक हैं।"   लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

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“जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासन भी नहीं टिक सकता। अतः जात-पांत के ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सब एक हो जाइए.” लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ..

31 अक्तूबर - जन्म दिवस / लौहपुरुष सरदार पटेल

15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों ने भारत को स्वाधीन तो कर दिया; पर जाते हुए वे गृहयुद्ध एवं अव्यवस्था के बीज भी बो गये। उन्होंने भारत के 600 से भी अधिक रजवाड़ों को भारत में मिलने या न मिलने की स्वतन्त्रता दे दी। अधिकांश रजवाड़े तो भारत में स्वेच्छा से मिल गये;..

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हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण मात्र नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व् सक्षम बनाना है | उसके आधार पर राष्ट्र की धारणा हो और हमारा समाज स्वस्थ एवं विकासोन्मुख जीवन व्यतीत कर सके, इसकी व्यवस्था करनी है | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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यदि यन्त्र मानव का स्थान लेकर उसे भूखा मारे तो वह उन उद्देश्यों के विपरीत होगा, जिनकी सिद्धि के लिए यन्त्र का आविष्कार हुआ | जड़ मशीन इसकी दोषी नहीं है | यह बुराई उस अर्थव्यवस्था की है, जिसमे विवेक लुप्त हो जाता है  | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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मतदान का अधिकार आपके सद्विचार और आपके सद्विवेक की कसौटी है | अतः उस ओर से उदासीन न हों , उसे बेचें नहीं और न उसे नष्ट होने दें | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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असंयम और गैर-जिम्मेदारी साथ साथ चलते हैं | लोकराज्य तभी सफल हो सकता है जब नागरिक अपनी जिम्मेदारी को समझेगा और उसका निर्वाह करने के लिए क्रियाशील रहेगा | समाज जितना यह समझता जाएगा की राज्य चलाने की जिम्मेदारी उसकी है , उतना ही वह संयमशील बनता चला जाएगा | - पं. दीनदयाल उपाध्याय..

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मर्यादाओं के अंतर्गत क्रिया का नाम संयम है | भूखा मरना संयम नहीं; अपितु शरीर की आवश्यकता के अनुरूप गुण और मात्र में भोजन करना संयम है | बिलकुल ना बोलना, यहाँ तक की अत्याचारों के विरुद्ध आवाज भी ना उठाना अथवा किसी को सत्परामर्श भी ना देना , संयम नहीं | वाचाल और गूंगे के बीच संयमी पुरुष आता है, जो आवश्यकता पढने पर बोलता है और अवश्य बोलता है |                                              ..

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जिस व्यवस्था में आर्थिक क्षमता तो बढ़े, किन्तु मानवता के अन्य अंगों के विकास की शक्ति कुंठित हो जाय, वह कल्याणकारी नहीं हो सकती | मानव ही हमारी व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए |              ..

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पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन दो अलग - अलग चीजें  हैं. जहाँ पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है ; और यदि हमें आगे बढ़ना है तो इसे हमारे द्वारा अवश्य अपनाया जाना चाहिए, वहीँ पश्चिमी जीवन और मूल्यों के बारे में ये बात सत्य नहीं है .   ..

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विश्व ऐसी स्थिति में नही है की हमारा कुछ मार्गदर्शन कर सके | वह तो स्वयं चौराहे पर है | ऐसी अवस्था में हम उससे किसी प्रकार का मार्गदर्शन नहीं पा सकते | हमें तो यह सोचना चाहिए की अब तक की विश्व की प्रगति देखते हुए कही ऐसी भी सम्भावना है या नहीं की हम उसक..

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जब तक पूरा भारत उठ कर खड़ा नहीं होगा, संसार में कोई हमारा आदर नहीं करेगा | इस दुनियाँ में दर की कोई जगह नहीं है केवल शक्ति की पूजा होती है | - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम..

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रचनात्मक नेतृत्व अपनी परम्परागत भूमिका से हटकर, कमांडर के स्थान पर कोच और प्रबंधक के स्थान पर, पथप्रदर्शक का काम करता है | - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम..

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भगवान, हमारे निर्माता ने हमारे मष्तिष्क और व्यक्तित्व में असीमित शक्तियां और क्षमताएं दी हैं। ईश्वर की प्रार्थना हमें इन शक्तियों को विकसित करने में मदद करती है । - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम..

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जाति अवसर को सीमित करती है. सीमित अवसर क्षमता को संकुचित करता है. संकुचित क्षमता अवसर को और भी सीमित कर देती है. जहाँ जाति का प्रचलन है, वहां अवसर और क्षमता हमेशा से सिकुड़ रहे कुछ लोगों के दायरे तक सीमित है. डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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अगर भारत बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी का प्रयोग करता है, तो करोड़ों लोगों को ख़त्म करने की आवश्यकता पड़ेगी | राम मनोहर लोहिया ..

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"मैं राजा राम का नहीं वनवासी राम का पूजक हूँ” | - विराट पुरुष नानाजी देशमुख ..

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मुझे सत्य का पालन करना पसंद है; बल्कि, मैंने औरों को उनके अपने भले के लिए सत्य से प्रेम करने और मिथ्या को त्यागने के लिए राजी करने को अपना कर्त्तव्य बना लिया है. अतः अधर्म का अंत मेरे जीवन का उदेश्य है. स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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मानव को अपने पल-पल को 'आत्मचिन्तन' मे लगाना चाहिए, क्योंकि हर क्षण हम 'परमेश्वर' द्वारा दिया गया 'समय' खो रहे है. -  - स्वामी दयानंद सरस्वती ..

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यदि कोई एक व्यक्ति को भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सर शर्म से झुकाना पड़ेगा . लालबहादुर शास्त्री ..

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हम सभी को अपने - अपने  क्षत्रों में उसी समर्पण , उसी उत्साह, और उसी संकल्प के साथ काम करना होगा जो रणभूमि में एक योद्धा को प्रेरित और उत्साहित करती है. और यह सिर्फ बोलना नहीं है, बल्कि वास्तविकता में कर के दिखाना है. लालबहादुर शास्त्री &n..

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यदि लगातार झगड़े होते रहेंगे तथा शत्रुता होती रहेगी तो हमारी जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा । परस्पर लड़ने की बजाय हमें गरीबी, बीमारी और अज्ञानता से लड़ना चाहिए । दोनों देशों की आम जनता की समस्याएं, आशाएं और आकांक्षाएं एक समान हैं । उन्हें लड़ाई-झगड़ा और गोला-बारूद नहीं, बल्कि रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता है । लालबहादुर शास्त्री ..

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यदि मैं एक तानाशाह होता तो धर्म और राष्ट्र अलग - अलग होते । मैं धर्म के लिए जान तक दे दूंगा । लेकिन यह मेरा निजी मामला है । राज्य का इससे कुछ लेना देना नहीं है । राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष कल्याण, स्वास्थ्य, संचार, विदेशी संबंधो, मुद्रा इत्यादि का ध्यान रखेगा..

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भ्रष्टाचार को पकड़ना बहुत कठिन काम है, लेकिन मैं पूरे जोर के साथ कहता हूँ कि यदि हम इस समस्या से गंभीरता और दृढ संकल्प के साथ नहीं निपटते तो हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में असफल होंगे. - लाल बहादुर शास्त्री..

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चलिए सुबह का पहला काम ये करें कि इस दिन के लिए संकल्प करें कि- मैं दुनिया में किसी से डरूंगा नहीं.- मैं केवल भगवान से डरूं । मैं किसी के प्रति बुरा भाव ना रखूं । मैं किसी के अन्याय के समक्ष झुकूं नहीं । मैं असत्य को सत्य से जीतुं । और असत्य का विरोध करते ..

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स्वदेशी की कल्पना बीते युग की तथा प्रतिगामीपन की घोतक समझी जाती है | विदेशों की हर वास्तु हम बड़े चाव से ले रहे हैं | विचार,व्यवस्था, पद्दति, पूंजी, उत्पादन प्रणाली, प्रौद्योगिकी तथा उपभोग के मानदंड - सभी क्षेत्रों में हम विदेशों पर निर्भर हैं | यह प्रगति ..

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हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण मात्र नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाना है | उसके आधार पर राष्ट्र की धारणा हो और हमारा समाज स्वस्थ एवं विकासोन्मुख जीवन व्यतीत कर सके, इसकी व्यवस्था करनी है | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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भारतीय परंपरा मानव को 'एकात्म' मानती हैं | एकात्म, यानी जिसको बांटा नहीं जा सकता | न बांटी जा सकने वाली इकाई को 'एकात्म' कहते हैं | समाज और व्यक्ति इस प्रकार जुड़े हुए हैं, उन्हें अलग अलग नहीं किया जा सकता | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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जिसकी लाठी उसकी भैंस - जंगल का विधान है | मानव की सभ्यता का विकास इस विधान को मानकर नही, बल्कि यह विधान न चल पाए इस व्यवस्था के कारण ही सभ्यता का विकास हुआ है | पं. दीनदयाल उपाध्याय ..

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हे भारत माता देश के हर नागरिक को राम की मर्यादा, कृष्ण की उन्मुक्तता और शिव के असीमित मष्तिस्क से गढ़ों |   डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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भारतीय राजनीति में अच्छाई और सच्चाई तभी देखने को मिल सकती है जब लोग चेहरे और पार्टी से से नही बल्कि कार्यो से लोगो की पहचान, तारीफ और आलोचना करे | डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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जाति प्रथा को तोड़ने का एक ही उपाय है वह है ऊची और नीची जातियों के बीच बराबर के हिस्से का रोटी और बेटी का सम्बन्ध | - डॉ. राम मनोहर लोहिया ..

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अंग्रेजी का इतना दबदबा कहीं नहीं है. इसीलिए भारत आजाद होते हुए भी गुलाम है. - डॉ. राम मनोहर लोहिया..

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मर्यादा केवल न करने की नहीं होती है, करने की भी होती है. बुरे की लकीर मत लांघो, लेकिन अच्छे की लकीर तक चहल पहल होनी चाहिए. डॉ. राममनोहर लोहिया ..

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अंग्रेजी का प्रयोग मौलिक सोच में अवरोध है, हीनता की भावनाओं का प्रजनक है और शिक्षित एवं अशिक्षित जनता के बीच की दूरी है. आइये, हम हिंदी की असल प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के लिए संगठित हो जाएं. - डॉ. राममनोहर लोहिया ..

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मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्छा है, मेरे बताए हुए रास्ते पर चलें ।    - डॉ. भीमराव आंबेडकर ..

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जब तक आप सामाजिक स्ववतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी हैं । - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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"भला हम भगवान को खोजने कहां जा सकते हैं अगर उसे अपने दिल और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते." - स्वामी विवेकानंद..

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जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है.  स्वामी विवेकानंद ..

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एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है. - महात्मा गाँधी..

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राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये । - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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जो कौम अपना इतिहास तक नही जानती है, वे कौम कभी अपना इतिहास भी नही बना सकती है | - डॉ. भीमराव अम्बेडकर..

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  डॉक्टर और गुरु के सामने झूठ मत बोलिए क्योकि यह झूठ बहुत महंगा पड़ सकता हैं | गुरु के सामने झूठ बोलने से पाप का प्रायश्चित नहीं होंगा, डॉक्टर के सामने झूठ बोलने से रोग का निदान नहीं होंगा | डॉक्टर और गुरु के सामने एकदम सरल और तरल बनकर पेश हो | आप कि..

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गुलाब कांटों में भी हंसता है गुलाब कांटों में भी हंसता है इसलिए लोग उसे प्रेम करते हैं, तुम भी ऐसे काम करो कि तुमसे नफरत करने वाले लोग भी तुमसे प्रेम करने पर विवश हो जायें।              &n..

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अगर तुम्हारी वजह से कोई इ्ंसान दुखी रहे तो समझ लो ये तुम्हारे लिए सबसे बड़ा पाप है, ऐसे काम करो कि लोग तुम्हारे जाने के बाद दु:खी होकर आसूं बहाए तभी तुम्हें पुण्य मिलेगा ।                        ..

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सत्य की कोई भाषा नहीं है. भाषा तो सिर्फ मनुष्य द्वारा बनाई गई है, लेकिन सत्य मनुष्य का निर्माण नहीं, आविष्कार है. सत्य को बनाना या प्रमाणित नहीं करना पड़ता. आदि शंकराचार्य ..

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कुरुते गंगासागर गमनं व्रत परिपालनम् अथवा दानम् । ज्ञान विहीनम् सर्वम् तेन मुक्ति न भवति जन्म शतेन ।। अर्थात,  चाहे तीर्थ जायें,उपवास करें या दान करें , ज्ञान नहीं है तो यह फलदायी नहीं होगा,              और सौ जन्मों में भी उद्धार नहीं होगा  । आदि शंकराचार्य ..

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शरीर और मन से शुद्ध - पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है । मनुस्मृति ..

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जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का आदर – सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका आदर – सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं भले ही वे कितना ही श्रेष्ट कर्म कर लें, उन्हें अत्यंत दुखों का सामना करना पड़ता है| - मनु स्मृति (श्लोक 3/56)..

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उस स्थान पर एक पल भी नही ठहरना चाहिए जहाँ आपकी इज्जत न हो, जहाँ आप अपनी जीविका नही चला सकते है जहाँ आपका कोई दोस्त नही हो और ऐसे जगह जहाँ ज्ञान की तनिक भी बाते न हो | आचार्य चाणक्य  ..

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कोई देश तब बिखर कर टूटने लगता है जब उसके घर की फूट पतंगों की भांति टिमटिमा कर बुझने लगती है और शासन जन की उपेक्षा करने लगता है, उस सीमा तक जिस सीमा तक की बाहर के शासक से भी आशा नहीं की जा सकती | आचार्य चाणक्य  ..

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किसी भी इंसान को मारना आसान है, परन्तु उसके विचारों को नहीं। महान साम्राज्य टूट जाते हैं, तबाह हो जाते हैं, जबकि उनके विचार बच जाते हैं।  - शहीद भगत सिंह ..

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जो लोंग मन को नियंत्रित नहीं करते। उनके लिए मन शत्रु के समान कार्य करता है। – श्रीमद्भगवद्गीता..

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भारत में हमारे विकास पथ में दो बड़ी बाधाएं है,  सनातन परम्पराओं की कमजोरियाँ और यूरोपीय सभ्यता की बुराइयाँ। मैं दोनों में से सनातन परम्पराओं की कमजोरियाँ अपनाना पसंद करूँगा ।  - स्वामी विवेकानंद ..

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आसेतु हिमाचल तक फैला हुआ हिन्दू समाज हमें संघठित करना है, संघ केवल स्वयंसेवको तक ही सीमित नहीं है, संघ बाहर के लोगो के लिए भी है. राष्ट्रोद्धार का सही मार्ग लोगों को दिखाना ही हमारा कर्तव्य है.  - प.पू. हेडगेवार..

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ऐसे व्यक्तित्व भी है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राण दे दिए. सत्य है वे आदरणीय, महान और प्रेरणा के स्रोत है. परन्तु जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण देश और धर्म के लिए दे दिया, जिन्होंने अपने आप को पूरा जीवन जलाते हुए अगणित लोगो के हृदय को जग..

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यदि आप सफल होना चाहते हैं तो अपना ध्यान समस्या खोजने में नहीं समाधान खोजने में लगाइए | --- स्वामी रामतीर्थ ---  ..

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भोपाल(विसंके). "भारतभूमि .... आसेतु हिमालय पर्यन्त एक 'सिद्ध कन्या' ही नहीं साक्षात माता है|" मूलाधार चक्र कन्याकुमारी' है, जहाँ का त्रिकोण शक्ति का स्त्रोत है| इसी मूलाधार से इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ प्रस्फुटित होती हैं| कैलाश पर्वत सहस्त्रार है..

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वेदान्त कोई पाप नहीं जानता, वो केवल त्रुटी जानता है. और वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ी त्रुटी यह कहना है कि तुम कमजोर हो, तुम पापी हो, एक तुच्छ प्राणी हो, और तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं है और तुम कुछ नहीं कर सकते. स्वामी विवेकानंद ..

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जो धर्म, सत्य, क्षेष्ठता और परमेश्वर के सामने झुकता है । उसका आदर समस्त संसार करता है । छत्रपति शिवाजी महाराज ..

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आत्मबल सामर्थ्य की तरफ ले जाता है, सामर्थ्य, विद्या प्रदान करता है |विद्या स्थिरता प्रदान करती है  और स्थिरता, विजय की तरफ ले जाती है | - छत्रपति शिवाजी महाराज ..

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सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर । अतः पहले खुद को नही राष्ट्र को देखना चाहिए । - छत्रपति शिवाजी महाराज ..

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हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है, तो उसे कष्ट ही मिलता है. यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ कभी नहीं छोड़ती |  -गौतम बुद्ध  ..

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अगर आप वाकई में अपने आप से प्रेम करते है, तो आप किसी दूसरे  को दु:खी नहीं कर सकते हैं | गौतम बुद्ध  ..

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एक समय में एक ही काम करो और पूरी निष्ठां और लगन से करो बाकि सब कुछ भुला दो | - स्वामी विवेकानंद ..

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कभी ना मत कहो, कभी यह न कहो कि  ‘मैं नहीं कर सकता’, क्योंकि आप अनंत हैं.  सभी शक्ति आप के भीतर है. आप कुछ भी कर सकते हैं | - स्वामी विवेकानंद  ..

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आप जो भी सोचेंगे. आप वही हो जाएंगे. अगर आप खुद को कमजोर सोचेंगे तो आप कमजोर बन जाएंगे. अगर आप सोचेंगे की आप शक्तिशाली हैं तो आप शाक्तिशाली बन जाएंगे.    -स्वामी विवेकानंद..

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ख्याति-प्रेम वह प्यास है जो कभी नहीं बुझती । वह अगस्त ऋषि की भांति सागर को पीकर भी शांत नहीं होती ।  - मुंशी प्रेमचंद ..

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समानता की बात तो बहुत से लोग करते हैं, लेकिन जब उसका अवसर आता है तो खामोश रह जाते हैं ।  - मुंशी प्रेमचंद ..

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भोपाल(विसंके). आशा उत्साह की जननी है । आशा में तेज है, बल है, जीवन है । आशा ही संसार की संचालक शक्ति है । - मुंशी प्रेमचंद ..

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  खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है, आगे बढ़ते रहने की लगन का । मुंशी प्रेमचंद ..

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केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है।   - प्रेमचंद..

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किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिये, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है.  - रवीन्द्रनाथ टैगोर ..

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जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है ; यदि हम उसे ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं.   -   रवीन्द्रनाथ टैगोर ..

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हर एक कठिनाई जिससे आप मुंह मोड़ लेते हैं,एक भूत बन कर आपकी नीद में बाधा डालेगी. रवीन्द्रनाथ टैगोर ..

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आस्था वह पक्षी है जो भोर के अँधेरे में भी उजाले को महसूस करती है - रवीन्द्रनाथ ..

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आपका लक्ष्य किसी जादू से नहीं पूरा होगा, बल्कि आपको ही अपना लक्ष्य प्राप्त करना पड़ेगा. कमजोर ना बनें, शक्तिशाली बनें और यह विश्वास रखें की भगवान हमेशा आपके साथ है । -लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ..

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धर्म और व्यावहारिक जीवन अलग नहीं हैं । संन्यास लेना जीवन का परित्याग करना नहीं है। असली भावना सिर्फ अपने लिए काम करने की बजाए देश को अपना परिवार बनाकर मिल-जुलकर काम करना है। इसके बाद का कदम मानवता की सेवा करना है और अगला कदम ईश्वर की सेवा करना है । - बालगंगाधर लोकमान्य तिलक..

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अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: विरोधी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है. लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाए? तब हमें आत्म – बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर निर्भर न करें. - शहीद भगत सिंह ..

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मैं यह बात जोर देकर कहता हूँ कि मैं महत्त्वाकांक्षा और  आशा एवं जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ. परन्तु आवश्यक होने पर मैं यह सब त्याग सकता हूँ, और वही सच्चा त्याग है. - शहीद भगतसिंह ..

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विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है.  - पंडित दीनदयाल उपाध्याय..

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अपने इस दोहे में संत कबीरदासजी कहते हैं की एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा न करो जैसे वो पैरों के नीचे आकर बुझ जाता हैं वैसे ही वो उड़कर आँख में चला जाये तो बहोत बड़ा घाव देता हैं। संत कबीरदास ..

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भोपाल(विसंके). यह देश यदि पश्चिम की शक्तियों को ग्रहण करे और अपनी शक्तिओं का भी विनाश नहीं होने दे तो उसके भीतर से जिस संस्कृति का उदय होगा वह अखिल विश्व के लिए कल्याणकारिणी होगी. वास्तव में वही संस्कृति विश्व की अगली संस्कृति बनेगी. महर्षि अरविन्द ..

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गुण कोई किसी को नहीं सिखा सकता. दूसरे के गुण लेने या सीखने की जब भूख मन में जागती है, तो गुण अपने आप सीख लिए जाते हैं. महर्षि अरविन्द ..

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युगों का भारत मृत नहीं हुआ है और न उसने अपना अंतिम सृजनात्मक शब्द उच्चारित ही किया है, वह जीवित है और उसे अभी भी स्वयं अपने लिए और मानव लोगों के लिए बहुत कुछ करना है और जिसे अब जागृत होना आवश्यक है - महर्षि अरविन्द..

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“जब दरिद्र तुम्हारे साथ हों, तो उनकी सहायता करो | लेकिन अध्ययन करो | और यह प्रयास भी करो कि तुम्हारी सहायता पाने के लिए दरिद्र लोग न बचे रहे |” महर्षि अरविन्द ..

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“आगामी वर्षों के लिए हमारा एक ही देवता होगा और वह है अपनी ‘मातृभूमि’ | भारत दूसरे देवताओं को अपने मन में लुप्त हो जाने दो हमारा मातृ रूप केवल यही देवता है जो जाग रहा है | इसके हर जगह हाथ है, हर जगह पैर है, हर जगह काम है, हर विराट की पूजा ही हमारी मुख्य पूजा है | सबसे पहले जिस देवता की पूजा करेंगे वह है हमारा देशवासी | ” - स्वामी विवेकानन्द..

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“लुढ़कते पत्थर में काई नहीं लगती” वास्तव में वे धन्य हैं. जो शुरू से ही जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं | जीवन की संध्या होते-होते उन्हें बड़ा संतोष मिलता है कि उन्होंने निरुद्धेश्य जीवन नहीं जिया तथा लक्ष्य खोजने में अपना समय नहीं गवाया | जीवन उस तीर की तरह होना चाहिए जो लक्ष्य पर सीधा लगता है और निशाना व्यर्थ नहीं जाता | - स्वामी विवेकानंद ..

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अखंड श्रद्धा और दृढ़ संकल्प यही जिनकी एकमात्र शक्ति होती है, ऐसे सामान्य मनुष्यों से ही देश के महान कार्य हुए हैं |    - परम पूजनीय गुरू..

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महानता के लिए छोटी - छोटी बातों को आयोजित करना पड़ता है. महान व्यक्तित्व एक ही दिन में तैयार नहीं होते, वे तो चुपचाप धीरे - धीरे क्रमवार रीति से बढ़ते हैं | त्याग प्रेम और आदर्श उनके व्यक्तित्व को महान बनाते हैं |    - परम पूजनीय गुरूजी..

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तीर्थ करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। सबसे अच्छा और बड़ा तीर्थ आपका अपना मन है, जिसे विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो। - आदि शंकराचार्य                                   ..

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जिस तरह एक प्रज्वलित दीपक के चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है। उसी तरह आत्मा जो खुद ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है, अपने खुद के ज्ञान के लिए। - आदि शंकराचार्य..

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मोह से भरा हुआ इंसान एक सपने कि तरह हैं, यह तब तक ही सच लगता है जब तक आप अज्ञान की नींद में सो रहे होते है। जब नींद खुलती है तो इसकी कोई सत्ता नही रह जाती है। - आदि शंकराचार्य..

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सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर। अतः पहले खुद को नही राष्ट्र को देखना चाहिए। - छत्रपति शिवाजी ..

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय। अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे - संत कबीरदास..

आज की अभिव्यक्ति

कबीर दास जी कहते हैं कि किसी भी सज्जन या साधु की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को हमें समझना चाहिए. हमेशा तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का. -संत कबीरदास ..